Deepak Baij questions authenticity of surrendered Naxals : छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में करीब 210 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। इस प्रकार के बड़े पैमाने पर सरेंडर को सरकार ने नक्सल हिंसा पर काबू पाने की दिशा में उपलब्धि बताया है। राज्य पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इसे अपनी रणनीति की सफलता के रूप में पेश किया।
दीपक बैज का सवाल
कांग्रेस नेता दीपक बैज ने पूछा, “क्या सभी सरेंडर करने वाले असली नक्सली हैं?” उनका तर्क था कि बड़ी संख्या में सरेंडर के दावे की सत्यता की जांच की जानी चाहिए,जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कोई निर्दोष व्यक्ति या आम नागरिक आकस्मिक रूप से नक्सली घोषित न किया गया हो।
नक्सलियों की पहचान पर चौकसी
दीपक बैज के सवाल के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि नक्सलियों की पहचान करने का सक्षम और पारदर्शी तरीका क्या है। प्रशासन द्वारा प्रस्तुत सरेंडर करने वालों की सूची और जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच अंतर स्पष्ट दिखा। अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भय या दबाव में आकर भी सरेंडर कर लेते हैं, जिससे असली और कथित नक्सलियों के बीच फर्क कर पाना चुनौतीपूर्ण होता है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया
पुलिस अधिकारियों ने कहा, कि सरेंडर करने वाले सभी व्यक्तियों की पृष्ठभूमि और गतिविधियों की जांच की गई है। अधिकारियों के अनुसार, पहचान प्रक्रिया में व्यक्तिगत पूछताछ, ग्रामीणों से तथ्य जुटाने,रिपोर्ट्स का सहारा लिया गया। कुछ मामलों में जांच गहराई से की जा रही है जिससे गलत पहचान की आशंका को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम ने क्षेत्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है। एक तरफ सरकार इस प्रकार के सरेंडर को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष एवं सामाजिक कार्यकर्ता जांच और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। यह चर्चा ग्रामीण समाज में भी है कि निर्दोष लोगों को नक्सली बताकर कानून का सहारा लिया जा सकता है, जो कि चिंता का विषय है।
210 नक्सलियों का सरेंडर सुरक्षा के लिए राहत की बात हो सकती है, लेकिन दीपक बैज का सवाल इस घटना का दूसरा पक्ष सामने रखता है। प्रशासन को पारदर्शी जांच और उचित पहचान प्रक्रिया कायम रखनी होगी जिससे कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
