Eco-friendly ganesha:अजब गजब मध्यप्रदेश में हमेशा से प्रकृति के संरक्षण के लिए जाना जाता रहा है समय समय पर तमाम उदाहरण भी देखने को मिलते है। एक बार फिर मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले की महिलाएं प्रकृति के संरक्षण का अनोखा तरीका लेकर आईं है । ये महिलाएं इस गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा की प्रतिमाएं गोबर से बनाने जा रही हैं. जो आस्था के साथ पर्यावरण के संतुलन के बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।
महिलाओं दे रही गोबर के गणेश से प्रकृति संरक्षण का संदेश
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 200 किलोमीटर दूर आगर मालवा जिले के लाडवन गांव की महिलाएं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई मिसाल पेश कर रही हैं। यहां महिलाएं गाय के गोबर से गणेश जी की पर्यावरण-हितैषी मूर्तियां बना रही हैं। इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी दूषित नहीं होता, बल्कि मिट्टी और जल को जीवनदायी बनाता है।
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गांव की रम्भा बनी मिसाल
गांव की 50 साल की रम्भा बाई बताती हैं कि उनकी चिंता सिर्फ अपने बेटों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी धरती के भविष्य को लेकर है। मूर्ति बनाते समय उनकी सोच यही रहती है कि ये मूर्तियां विसर्जन के बाद धरती को जहर नहीं, बल्कि जीवन लौटाएं।
अपने साथ 35 महिलाओं को जोड़ा
रम्भा बाई कहती हैं कि प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियां पानी में घुलती नहीं और उनसे जल-जंतु व पशु-पक्षी प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि गांव की 35 महिलाओं ने ट्रेनिंग लेकर गोबर से मूर्तियां बनाना शुरू किया।
लाडली बहना के पैसों से करी शुरुआत
शुरुआत आसान नहीं थी। रम्भा बाई ने जब परिवार से पैसे मांगे तो उन्हें यह कहकर मना कर दिया गया कि मजदूरी से घर-गृहस्थी ही मुश्किल से चल पाती है। तब उन्होंने “लाडली बहना योजना” से मिले पैसे का इस्तेमाल किया। आजीविका मिशन के सहयोग से उन्होंने सांचे और सामग्री मंगवाई और मूर्तियों का काम शुरू कर दिया।
महिलाओं की आजीविका बनी गोबर गणेश
आज लाडवन गांव की महिलाएं न सिर्फ आस्था से जुड़ा कार्य कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण बचाने के साथ अपनी आजीविका भी मजबूत कर रही हैं। गाय के गोबर से बने गणेश अब गांव की पहचान बन गए हैं और आने वाले समय में ये पहल पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बनेगी।
शिक्षा से कहीं ज्यादा बड़ी है रम्भा की सोच
Eco-friendly ganesha:हम में से कई पढ़े लिखे लोग पर्यावरण संरक्षण की बातें करते है तमाम लोग लम्बे लम्बे व्याख्यान देते है और दूसरी तरफ उन्हीं व्याख्या में प्लास्टिक की बोतल से पानी पीकर और प्लास्टिक बढ़ाते है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र की कम शिक्षा प्राप्त महिला पर्यावरण संरक्षण का यह सच्चा प्रयास हमें उन से सीखने का अवसर प्रदान करता है ।