बिहार विधानसभा चुनाव अब अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है। इस चरण में राज्य के सीमांचल इलाकों में मतदान होना है, जो अपनी जनसांख्यिकीय और राजनीतिक विविधता के लिए जाना जाता है। सीमांचल के चार जिलों — पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज — में 11 नवंबर को वोटिंग होगी। इस बार का चुनाव सीमांचल के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि यहां AIMIM का भविष्य दांव पर है।
Bihar elections 2025: मुस्लिम बहुल इलाका

बिहार का सीमांचल इलाका लंबे समय से राज्य की राजनीति में एक खास भूमिका निभाता रहा है। यह इलाका न सिर्फ सीमा से लगा हुआ है, बल्कि यहां की सामाजिक और धार्मिक संरचना भी इसे बाकी बिहार से अलग पहचान देती है।
चार जिलों — पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज — में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। यही वजह है कि यहां चुनावी समीकरण अक्सर धार्मिक और जातीय संतुलन पर आधारित होते हैं।
2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया था। हालांकि, बाद में पार्टी के चार विधायक राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में शामिल हो गए, जिससे पार्टी का संगठन कमजोर हो गया। अब 2025 के चुनाव में AIMIM के सामने अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की चुनौती है।
AIMIM, JDU और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर

सीमांचल की राजनीति में पूर्णिया जिले की अमौर विधानसभा सीट इस बार सबसे चर्चित है। इस सीट पर मुकाबला तीन प्रमुख उम्मीदवारों के बीच है —
AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा विधायक अखतरुल ईमान
जदयू के उम्मीदवार सबा जफर

और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब्दुल जलील मस्तान।
यह सीट पूरी तरह से मुस्लिम बहुल इलाका है। यहां करीब 70 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जबकि 24 फीसदी हिंदू आबादी है। कुछ आदिवासी मतदाता भी इस सीट पर चुनावी परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
18 चुनावों में 17 बार मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत
अमौर विधानसभा सीट का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। 1952 से अब तक यहां 18 बार चुनाव हुए हैं। इनमें से 17 बार मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है, जबकि सिर्फ एक बार, 1977 में जनता पार्टी के चंद्रशेखर झा ने जीत हासिल की थी।
इस सीट पर सबसे ज्यादा बार जीतने वाले नेता हैं अब्दुल जलील मस्तान, जिन्होंने 6 बार जीत दर्ज की है। वहीं, सबा जफर ने 2 बार, और अखतरुल ईमान ने अब तक एक बार यहां से जीत हासिल की है।
सबा जफर का राजनीतिक सफर
सबा जफर का राजनीतिक करियर एक दिलचस्प यात्रा रहा है। उन्होंने 2010 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। उसी साल उन्होंने अमौर सीट से कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचे।
2015 के चुनाव में बीजेपी ने उन्हें दोबारा टिकट दिया, लेकिन इस बार वे हार गए। इसके बाद उन्होंने पार्टी बदली और 2020 के चुनाव में जदयू (JDU) के टिकट पर मैदान में उतरे।
हालांकि, इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा और AIMIM के अखतरुल ईमान ने उन्हें हराकर सीट पर कब्जा किया।
Bihar elections 2025: सीमांचल के कांग्रेस के कद्दावर नेता
अब्दुल जलील मस्तान सीमांचल क्षेत्र में कांग्रेस के सबसे अनुभवी और लोकप्रिय नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक करियर में छह बार अमौर से जीत दर्ज की है।
मस्तान का स्थानीय स्तर पर मजबूत जनसंपर्क नेटवर्क और संगठनात्मक पकड़ उन्हें इस बार भी मुकाबले में बनाए हुए है। हालांकि, कांग्रेस के सीमांचल में घटते प्रभाव और AIMIM की बढ़ती पकड़ ने उनके लिए चुनौती जरूर बढ़ा दी है।
AIMIM के एकमात्र विधायक अखतरुल ईमान
AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अखतरुल ईमान वर्तमान में बिहार विधानसभा में पार्टी के इकलौते विधायक हैं। 2020 के चुनाव में उन्होंने सीमांचल में पार्टी का परचम लहराया था, लेकिन अब जब चार विधायक RJD में शामिल हो चुके हैं, तो AIMIM का पूरा भविष्य ईमान के प्रदर्शन पर टिका हुआ है।
Bihar elections 2025: अखतरुल ईमान को इस बार सबा जफर (जदयू) और अब्दुल जलील मस्तान (कांग्रेस) से कड़ी टक्कर मिल रही है।
अगर ईमान अपनी सीट बचाने में कामयाब रहते हैं, तो यह AIMIM के लिए बड़ी राहत होगी। वहीं, अगर हारते हैं, तो यह बिहार में पार्टी की मौजूदगी पर सवाल खड़ा कर सकता है।
