Bhuvaneshwari Devi Hamirpur: बुंदेलखण्ड की धरती पर कई देवी-देवताओं के स्थान हैं और उनसे जुड़ी लोगों की आस्थाएं भी अलग-अलग हैं. इन्हीं में से एक है उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जनपद से महज 12 किमी दूर झलोखर गांव में भुवनेश्वरी देवी का अनूठा स्थान। जहां न मंदिर है और न कोई मूर्ति…नीम के पेड़ के नीचे एक भारी-भरकम टीले पर विराजमान है देवी मां। लोगों का मानना है कि यहां की मिट्टी लगाने मात्र से गठिया रोग से जूड़ी तमाम परेशानियां ठीक हो जाती है।
भुइंया रानी के नाम से जानी जाती है मां
झलोखर गांव में विराजमान मां भुवनेश्वरी देवी को आसपास के इलाकों में मां भुइंया रानी के नाम से जानते है। इस मंदिर की दूर-दूर तक बहुत मान्यता है. कहा जाता है कि इस मंदिर की मिट्टी लोगों को यहां आने के लिए विवश करती है. ये मिट्टी बेहद शक्तिशाली है. उसे शरीर पर लगाने भर से गठिया और वात से जुड़े अन्य रोग छूमंतर हो जाते हैं.
नीम के पेड़ के नीचे बना चबूतरा
आज भी मंदिर के नाम पर यहां नीम के पेड़ के नीचे सिंर्फ एक चबूतरा बना हुआ है और चबूतरे पर कुछ मूर्तियां रखी हुई हैं. लेकिन भक्तों की आस्था यहां की मिट्टी से जुड़ी है।
Bhuvaneshwari Devi Hamirpur: दूध गिराकर जाती थी गाय
मंदिर के पुजारी राजेन्द्र प्रजापति की मानें तो सैकड़ों साल पहले ये स्थान झीलों और झाड़ियों से भरा हुआ था। गौर वंशी सैनिक यहां आए तो उन्होंने देखा कि रात को एक गाय जंगल में से यहां आयी और एक स्थान पर अपना सारा दूध निकाल कर चली गई. ये देखकर सभी सैनिक सोच में पड़ गये। जब उन्होंने देखा कि जहां गाय ने दूध गिराया है उस झाड़ी में एक मूर्ति रखी है। सैनिकों ने उसी मूर्ति को चबूतरा बना कर स्थापित किया।
आषाढ़ मास के रविवार का महत्व
मां भुवनेश्वरी देवी के इस मंदिर में आषाढ़ मास के रविवार की विशेष मान्यता है. इस दिन यहां मेला लगता है. जिसमें हजारों श्रद्धालु मां भुइंया रानी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय निवासी की मानें तो वात रोगी शनिवार को यहां आ जाते हैं और खाने पीने का सामान अपने साथ लाते हैं.
Bhuvaneshwari Devi Hamirpur: भौरियां बनाकर खाते है श्रद्धालु
रविवार को वे भौरियां बनाकर खाते है. और निशुल्क भण्डारा ग्राम वासियों द्वारा आयोजित किया जाता है वे यहां स्थित प्रेमसागर तालाब में स्नान करते हैं. फिर माता के दरबार मे अर्जी लगाते हैं. और इसके बाद शरीर पर मिट्टी का लेप लगाकर वात को एक डंडी की मदद से झड़वाते हैं। यहां स्थित तालाब की मिट्टी मंदिर के चबूतरे में डाली जाती है।
इस मंदिर की एक और खासियत है यहां अब तक चबूतरे पर छत का निर्माण नहीं हो पाया है. क्योंकि जब कभी भी किसी ने छत को बनवाने की कोशिश की, तो वो छत खुद टूट गई। इसलिए ये मंदिर सालों से ऐसा ही है।
