कभी यह ज़मीन सन्नाटे से भरी रहती थी।
लोग पास से गुजरते थे, पर ठहरते नहीं थे।
भोपाल की यह वही जगह है जहां 1984 की सर्द रात ने भोपाल की सांसें छीन ली थीं। हजारों लोग सोते-सोते हमेशा के लिए खामोश हो गए। जिनकी जान बची, उनकी ज़िंदगी बदल गई। आज, चार दशक बाद, उसी जगह पर एक नया अध्याय लिखने की तैयारी है।
दर्द की ज़मीन पर विकास की योजना
यूनियन कार्बाइड कारखाने की लगभग 87 एकड़ जमीन अब खाली है। वर्षों तक यहां रासायनिक कचरा पड़ा रहा। आसपास रहने वाले लोग डर में जीते थे। पानी कैसा है? हवा सुरक्षित है या नहीं? सवाल खत्म नहीं होते थे। पिछले साल सरकार ने दावा किया कि परिसर में जमा जहरीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निष्पादन कर दिया गया है। विशेषज्ञों की निगरानी में प्रक्रिया पूरी हुई। प्रशासन का कहना है कि इससे पर्यावरणीय खतरा काफी हद तक कम हुआ है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

अब क्या बनने जा रहा है यहाँ?
सरकार की योजना सिर्फ एक स्मारक बनाने तक सीमित नहीं है। प्रस्ताव बड़ा है। बहुआयामी है। योजना के मुताबिक इस जमीन पर बनेगा
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गैस त्रासदी स्मारक
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साइंस पार्क
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आधुनिक कन्वेंशन सेंटर
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राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए समर्पित प्रयोगशाला
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विकास आधारित राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र
सवाल उठता है क्या यह केवल निर्माण परियोजना है? या अतीत के घावों पर मरहम रखने की कोशिश?
स्मारक सिर्फ दीवारें नहीं होता
भोपाल के पुराने शहर में आज भी ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिनकी तीन पीढ़ियाँ उस रात से प्रभावित हैं। किसी की आंखों की रोशनी गई। किसी के फेफड़े कमजोर हो गए। कई बच्चों ने जन्म से ही बीमारियां झेली।
ऐसे में प्रस्तावित स्मारक सिर्फ पत्थर की इमारत नहीं होगा। यह उन लोगों की आवाज बनेगा जो अदालतों और फाइलों में गुम हो गए। अगर इसे संवेदनशील तरीके से विकसित किया गया, तो यह देश में औद्योगिक सुरक्षा पर गंभीर बहस का केंद्र बन सकता है।
साइंस पार्क और रिसर्च सेंटर क्यों अहम हैं?
भोपाल की त्रासदी ने एक बड़ा सवाल छोड़ा था क्या हमारे औद्योगिक सुरक्षा मानक पर्याप्त हैं? योजना में शामिल आधुनिक प्रयोगशाला और रिसर्च सेंटर भविष्य की आपदाओं को रोकने की दिशा में काम कर सकते हैं। रासायनिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन इन सब पर शोध हो सकता है। अगर यह पहल ईमानदारी से लागू हुई, तो भोपाल पीड़ा की पहचान से आगे बढ़कर सुरक्षा और शोध का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।
स्थानीय लोगों की उम्मीद
शहर में इस परियोजना को लेकर लोग इसे ऐतिहासिक कदम मानते हैं। उनका कहना है कि आखिरकार उस जमीन का उपयोग सकारात्मक काम में होगा।
