बैतूल आमला ब्लॉक के कन्नड़गांव में 50 वर्षीय महिला ललिता परते के अंतिम संस्कार को लेकर मचा विवाद, धर्मांतरण के कारण ग्रामीणों ने किया बहिष्कार, फिर आदिवासी परंपराओं में लौटने पर दी अनुमति.
ग्रामीण नहीं हुए अंतिम संस्कार में शामिल
बैतूल के आमला ब्लॉक के कन्नड़गांव के एक आदिवासी परिवार को उस समय तकलीफ झेलनी पड़ी, जब 50 साल की ललिता परते की मौत के बाद ग्रामीणों ने उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने से इंकार कर दिया. साथ ही उन्हें गांव के एकमात्र श्मशान घाट का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी. ग्रामीणों पर आरोप है कि मृतका के परिवार ने सालों पहले ईसाई धर्म अपना लिया था. इसलिए उन्हें गांव के श्मशान घाट का उपयोग करने का अधिकार नहीं है.”
श्मशान घाट भी नहीं ले जाने दिया शव
मृतका ललिता के पुत्र राजाराम ने बताया कि “हमारे आदिवासी समाज के लोगों को हम पर कई सालों से संदेह था कि हमने ईसाई धर्म अपना लिया है. जैसे गांव वालों का पता लगा कि मेरी मां की मृत्यु हो गई है. गांव वालों ने मेरे घर आने से इंकार कर दिया और शव को गांव के श्मशान घाट में दफनाने से भी मना कर दिया था. समाज के लोगों का कहना था कि इस परिवार से हमारे कोई संबंध नहीं है.”
माफी मांगी तब हुआ अंतिम संस्कार
राजाराम ने बताया,”हालात तब समान्य हुए, जब गांव में बड़े-बुजुर्गों और पंचायत के सामने मेरे परिवार के सदस्य जिसमें 3 बेटियां और दामाद ने गांव के देवी-देवताओं की कसम खाकर माफी मांगी. साथ ही कहा कि हम फिर से आदिवासी समाज में शामिल हो रहे हैं. गांव की परंपराओं में शामिल होंगे और गांव की सभी परंपराओं को मानेंगे. तब जाकर कहीं ग्रामीण माने और मृतका का अंतिम संस्कार गांव के श्मशान घाट में करने के अनुमति दी. इसके बाद आदिवासी परंपरा के अनुसार मृतका का अंतिम संस्कार किया गया. कन्नड़गांव ग्राम पंचायत आदिवासी बाहुल्य है. यहां लगभग 70 फीसदी आदिवासी परिवार रहते हैं.
आदिवासी परंपरा से हुआ अंतिम संस्कार
इस मामले में गांव की पंच रेवती कवड़े ने कहा कि “ललिता के पति की मृत्यु कई साल पहले हो गई थी. ललिता व उनके परिवार ने आज से करीब 5 वर्ष पहले ईसाई धर्म अपनाया लिया था. इसके बाद ललिता और उसका परिवार ईसाई धर्म का पालन करने लगे थे. उनका परिवार गांव के किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेता था, इसलिए समाज के लोगों ने उनसे भी दूरी बना ली थी.”
लौटने के वादे पर स्वीकारा समाज
गांव की सरपंच सविता सरयाम ने बताया कि “परिवार लंबे समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था, इसलिए समाज ने उनसे दूरी बना ली थी, लेकिन सार्वजनिक रूप से परंपराओं में लौटने का वादा करने पर समाज ने उन्हें फिर से स्वीकार कर लिया.” ग्राम सचिव आशीष नागले ने कहा कि “पंचायत जबरन धर्म परिवर्तन की निंदा करती है और शासन स्तर से पीड़ित परिवार को हर संभव मदद दिलाई जाएगी.”
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