संस्कृत के श्लोकों से मिलते हैं मानसिक और शारीरिक फायदे
लखनऊ: आजकल की तेज़-तर्रार जीवनशैली में तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं सामान्य बन गई हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण इन समस्याओं से न केवल राहत दिला सकता है, बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान कर सकता है?

हाल ही में सेंट्रल ऑफ बायोमेडिकल रिसर्च (CBMR) द्वारा किए गए एक शोध ने इस विषय में कुछ अहम जानकारी दी है। शोध से यह साबित हुआ है कि संस्कृत श्लोकों का उच्चारण मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है, और इससे न केवल तनाव बल्कि कई अन्य मानसिक समस्याओं में भी राहत मिलती है।
सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च का शोध
डॉ. उत्तम कुमार, जो इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक हैं, ने बताया कि संस्कृत भाषा का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस शोध में दो समूहों पर परीक्षण किया गया था: एक समूह में वेद विद्यालय के संस्कृत में प्रशिक्षित 22 छात्र थे, जबकि दूसरे समूह में सामान्य 22 छात्र शामिल थे। इस शोध में पाया गया कि संस्कृत पढ़ने और सुनने से मस्तिष्क में सकारात्मक बदलाव आते हैं, जिससे तनाव, चिंता और अवसाद में कमी आती है।

शोध में क्या खुलासा हुआ?
फंक्शनल एमआरआई के जरिए जब शोधकर्ताओं ने छात्रों के दिमाग का अध्ययन किया, तो कई अहम परिणाम सामने आए। इस परीक्षण में देखा गया कि जब छात्र हेडफोन पर श्लोक सुनते थे, तो उनके दिमाग के कई सक्रिय क्षेत्र जैसे भावनाओं, सोच, ध्यान, स्मृति, कल्पना और समझ से जुड़े अंग अधिक सक्रिय हो जाते थे। इससे यह सिद्ध हुआ कि संस्कृत श्लोक मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सुधारते हैं।
श्लोकों का असर: शारीरिक और मानसिक लाभ
- महामृत्युंजय मंत्र: यह श्लोक भय और डर को दूर करने में सहायक होता है। यह मंत्र शारीरिक और मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है और व्यक्ति को आत्मविश्वास से भरपूर करता है।
- गायत्री मंत्र: इस श्लोक से मानसिक तनाव और चिंता को कम किया जा सकता है। गायत्री मंत्र मानसिक शांति का स्रोत माना जाता है और यह विचारों को केंद्रित करने में मदद करता है।
- अन्य धार्मिक श्लोक: शोध में यह भी सामने आया है कि विभिन्न श्लोकों का मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर असर पड़ता है। हर श्लोक का विशिष्ट कार्य है, और यह जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
सांसारिक लाभ के अलावा बौद्धिक विकास भी
शोध में यह भी पाया गया कि संस्कृत केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए भी अत्यंत प्रभावी है। डॉ. उत्तम कुमार ने बताया कि संस्कृत के नियमित उच्चारण से बच्चों में ध्यान, स्मृति और भाषिक क्षमता में सुधार होता है। इससे बच्चों के बौद्धिक विकास में मदद मिलती है और उनकी मानसिक क्षमताएं जागृत होती हैं।
सीबीएमआर द्वारा की गई इनोवेटिव स्टडी
इस शोध में अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। नॉन मेटल हेडफोन का प्रयोग किया गया, जिसकी कीमत करीब 25 लाख रुपये है, ताकि फंक्शनल एमआरआई के दौरान मस्तिष्क में होने वाले बदलावों को सही तरीके से मापा जा सके। इस दौरान वैज्ञानिकों ने देखा कि मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों में गतिविधि बढ़ गई, जो श्लोकों के उच्चारण से जुड़ी थी।
संस्कृत पर अन्य शोध
इस शोध से पहले भी कई शोध हुए हैं, जिनमें यह साबित हुआ कि संस्कृत के मंत्रों का नियमित उच्चारण मस्तिष्क के उन हिस्सों के आकार को बढ़ाता है, जो संज्ञानात्मक कार्यों से जुड़े होते हैं। डॉ. जेम्स हार्टसेल, न्यूरोसाइंटिस्ट ने अपने अध्ययन में यह दावा किया था कि संस्कृत मंत्रों का उच्चारण भावनाओं को समझने में मदद करता है और मस्तिष्क के मिरर न्यूरॉन सिस्टम को सक्रिय करता है, जो दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायक होते हैं।

