barsana lathmar holi: राधा-रानी की नगरी बरसाना में रंग, भक्ति और परंपरा के अद्भुत संगम में पूरी तरह डूबी दिखी। शाम होते-होते यहां विश्व प्रसिद्ध लठामार होली का नजारा ऐसा था कि छतों से लेकर गलियों तक अबीर-गुलाल उड़ता रहा। नंदगांव से आए हुरियारों पर बरसाने की हुरियारिनों ने प्रेम की लाठियां बरसाईं और हर ओर राधा-कृष्ण के जयकारे गूंजते रहे.यह नजारा सिर्फ देखने का नहीं था, महसूस करने का था, ऐसा जो बरसाना पहुंचे बिना पूरा नहीं होता।

barsana lathmar holi: रंगीली गली से लाड़ली जी मंदिर तक उत्सव
योगी सरकार ने इस बार रंगोत्सव 2026 को खास रूप देते हुए आयोजन को और भव्य बनाया। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु इस अनूठी होली के साक्षी बने. नंदगांव के हुरियारों के बरसाना पहुंचते ही प्रिया कुंड पर उनका आत्मीय स्वागत हुआ। बरसाना वासी उन्हें कृष्ण के सखा और दामाद की तरह देखते हैं, इसलिए मिठाई, पकोड़े, ठंडाई और भांग से खातिरदारी की गई.इसके बाद हुरियारों ने पाग बांधी और ब्रह्मांचल पर्वत स्थित श्री लाडली किशोरी जी मंदिर पहुंचकर राधा रानी से होली खेलने की अनुमति ली। इसी दौरान हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा हुई, जिसने पूरे माहौल को और दिव्य बना दिया।
barsana lathmar holi: ढोल-नगाड़ों की थाप पर ब्रज रसिया
दर्शन के बाद शाम करीब चार बजे हुरियारे रंगीली गली पहुंचे। यहां ढोल-नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक ब्रज रसिया और होली गीत गाए गए। हुरियारों की टोलियों ने गीतों के जरिए हुरियारिनों को रिझाने की कोशिश की और फिर वही पल आया, जब प्रेम की लाठियां बरसने लगीं.गुलाल से सनी गलियों में कदम रखना भी मुश्किल था, लेकिन श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान नहीं, सिर्फ आनंद दिख रहा था।
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पांच हजार साल पुरानी परंपरा
मान्यता है कि यह परंपरा करीब 5000 साल पुरानी है। कथा के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ राधा रानी और उनकी सखियों को चिढ़ाने बरसाना आए थे। तब सखियों ने लाठियां उठाकर उन्हें खदेड़ा था, और वही लीला आज परंपरा बन चुकी है.ब्रज क्षेत्र में होली बसंत पंचमी से शुरू होकर करीब 45 दिन तक चलती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा और खास आकर्षण यही लठामार होली मानी जाती है।
लाठियों में भी झलकता है प्रेम
श्रद्धालु भारती ने कहा, “मैंने जीवन में पहली बार ऐसी होली देखी। लाठियों की मार में भी जो प्रेम और भक्ति का भाव है, वो सिर्फ ब्रज में ही महसूस किया जा सकता है। ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात कान्हा सामने होली खेल रहे हों.वहीं श्रद्धालु स्वाति ने कहा कि प्रशासन की व्यवस्थाएं काबिल-ए-तारीफ रहीं। “इतनी भीड़ के बावजूद हर चीज सुचारु रही। जब आसमान से फूल बरसे, तो मन अपने आप भर आया.बरसाना की यह होली हर साल यही याद दिलाती है कि यहां रंग सिर्फ गुलाल के नहीं होते, परंपरा और प्रेम के भी होते हैं।
