assistant professor recruitment up 2025 : पेपर लीक के बाद 4 अफसरों की टीम तैनात, आयोग की साख पर सवाल
assistant professor recruitment up 2025 : उत्तर प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा 2025 को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। अब इस भर्ती प्रक्रिया पर पहली बार शासन स्तर से सीधी निगरानी रखी जाएगी। यह कदम 16 और 17 अप्रैल 2025 को कराई गई परीक्षा के बाद उठे विवादों और पेपर लीक के आरोपों के बाद लिया गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस सिलसिले में चार सदस्यीय निगरानी टीम का गठन किया है, जिसमें प्रशासन, पुलिस और उच्च शिक्षा निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
🔍 क्या है मामला? पहली परीक्षा में ही पेपर लीक का आरोप
यूपी के अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में 910 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर भर्ती के लिए 33 विषयों में परीक्षा कराई गई थी। 1 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने इसमें भाग लिया।
परीक्षा के कुछ ही घंटे बाद सोशल मीडिया पर पेपर लीक होने के स्क्रीनशॉट्स वायरल हो गए। इसके बाद लखनऊ, प्रयागराज और कानपुर में धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए।
🧑⚖️ STF ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जांच में पाया गया कि लीक हुआ पेपर असली नहीं था। बावजूद इसके, परीक्षा की पारदर्शिता पर संदेह बना रहा।
🏛️ शासन ने संभाली कमान: पहली बार सीधी निगरानी
विशेष सचिव गिरिजेश कुमार ने परीक्षा प्रक्रिया की मॉनिटरिंग के लिए चार वरिष्ठ अधिकारियों की टीम बनाई:
- एडीएम सिटी सत्यम मिश्र
- एएसपी गीतांजलि सिंह
- एसटीएफ एएसपी विशाल विक्रम सिंह
- सहायक निदेशक (उच्च शिक्षा निदेशालय) अजीत कुमार सिंह
यह टीम अब पूरा लेखा-जोखा रखेगी कि आगे की प्रक्रिया समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी हो।
🏢 आयोग पर क्यों उठ रहे सवाल?
अगस्त 2023 में गठित उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का यह पहला बड़ा चयन अभियान है। आयोग के पास अध्यक्ष, 12 सदस्य, सचिव, परीक्षा नियंत्रक और अन्य आवश्यक पदाधिकारी हैं। फिर भी शासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
❓ सवाल उठता है: जब पूरा ढांचा है, तो शासन को बीच में आने की जरूरत क्यों पड़ी?
इससे आयोग की स्वायत्तता, कार्यक्षमता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
📚 टीजीटी-पीजीटी भर्ती पर भी विवाद
- 3539 टीजीटी और 624 पीजीटी पदों पर भर्ती की प्रक्रिया 9 जून 2022 को शुरू हुई थी।
- आवेदन की अंतिम तिथि 16 जुलाई 2022 थी।
- लेकिन तीन साल बाद भी परीक्षा आयोजित नहीं हो सकी।
- PGT परीक्षा तीन बार, TGT दो बार स्थगित हो चुकी है।
- PGT के लिए 4.5 लाख और TGT के लिए 8.69 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया।
अब अभ्यर्थी सरकार और आयोग दोनों से नाराज़ हैं।
⚖️ सरकार पर दबाव और साख की चुनौती
सरकार के लिए यह सिर्फ भर्ती नहीं, बल्कि विश्वास का मामला बन गया है। एक तरफ जहां युवाओं का भविष्य इस प्रक्रिया से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर शासन की विश्वसनीयता भी दांव पर लगी है।
शासन के इस फैसले को दो तरह से देखा जा रहा है:
- ✅ सकारात्मक पहल, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
- ❌ नकारात्मक संकेत, जो आयोग की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।
🗣️ क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. आलोक शुक्ला कहते हैं:
“सरकार को चाहिए कि आयोग को संस्थागत रूप से मजबूत करे। निगरानी टीम बनाना एक अस्थायी समाधान है, लेकिन इससे दीर्घकालिक सुधार संभव नहीं।”
✅ क्या भरोसा लौटेगा?
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि शासन की सीधी निगरानी में यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता के नए मानक स्थापित कर पाएगी या नहीं। अभ्यर्थी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकारी भर्तियों में हो रही अनियमितताओं पर लगाम लगेगी और योग्य उम्मीदवारों को न्याय मिलेगा।
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