Save Aravali Hills: अरावली…ये सिर्फ पहाड़ियां नहीं गौरव है राजस्थान का। इन पहाड़ियों का कण-कण वीरो की गाथा सुनाता है। अरावली है तो राजस्थान में पानी है।
आज इसी अरावली को उखाड़ने की बात की जा रही है। इस आर्टिकल में जानिए कैसे एक फैसले ने देश के सबसे उम्र दराज पहाड़ के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया। एक तरफ सरकार इसे हटाने की बात कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ एक बड़े आंदोलन की गूंज सुनाई दे रही है।
अरावली री छाया में, साज्यो थारो मान।
पत्थर-पत्थर बोले गाथा, वीरां रो सम्मान।
अरावली बिन राजस्थान, सूनी लागै जान।
म्हांरी अरावली सिखावे, धीरज रो ज्ञान।
कोर्ट का फैसला
अरावली वो है जिसने गंगा-जमना के मैदानों को रेगिस्तान बनने से रोका, इस भूभाग का भुगोल ओर मौसम तय किया। आज वहीं अरावली संकट में है। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
100 मीटर से कम पहाड़ अरावली का हिस्सा नहीं
Save Aravali Hills: इशु रिलेटिंग टु डेफिनेशन ऑफ अरावली हिल्स एक रेंजेस नाम से जारी फैसले में अरावली की नई परिभाषा बताई गई। CEC की उस परिभाषा को मान्यता दे दी गई जिसमें कहा गया की 100 मीटर से कम के पहाड़ अरावली का हिस्सा है ही नहीं।

कैसे बनी अरावली?
अरावली उस वक्त बनी जब इंडियन टेक्टॉनिक प्लेट युरेशियन टेक्टोनिक प्लेट से अलग हो रही थी। पहली बार जीवन इसी पर्वत पर पैदा हुआ। लेकिन अब उसी अरावली की परिभाषा बदल दी गई।
फॉरेस्ट ठफ इंडिया की 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक 1281 पहाड़ थे जिनमें से केवल 1048 पहाड़ ही सुप्रिम कोर्ट के 100 मीटर के नए बेंच मार्क को पार कर पाए, यानी 90% हिस्से को अरावली माना ही नहीं जाएगा।
और कमाल की बात तो ये है कि जिस पटिशन के चलते अरावली की नई परिभाषा तय की गई उसका अरावली से कोई सीधा लेना देना था ही नहीं।
Save Aravali Hills: तमीलनाडु से कनेक्शन
दरअसल, नीलगिरी के जंगलों की हिफाजत को लेकर 30 साल पहले एक मुकदमा हुआ था। जब तमीलनाडु के एक जमींदार TN गौदावर्मन ने एक पिटिशन दाखिल की थी की नीलगिरी के जंगलों में अवैध रूप से पेड़ो की कटाई की जा रही है। इसके बाद कोर्ट ने कहा की जो जमीन जंगल है वो जंगल ही रहेगी। ये इस केस को खुला ही रखा गया।
इसके बाद 2024 में हरियाणा राजस्थान दिल्ली गुजरात सरकार की अंतरिम अपील के आधार पर एक सेंट्रल एंपावर्ड कमिटी बनाने के निर्देश दिए। सुप्रिम कोर्ट ने इस कमिटी को अरावली की परिभाषा तय करने को कहा। इसके बाद ये काम मल्टी एजेंसी कमिटी को सौंप दिया गया। इस कमिटी ने नए पैमाने बनाए और 100 मीटर से कम के पहाड़ के अरावली मानने से इनकार कर दिया।

अवैध खनन को लेकर सरकार
ये जानकारी जब बाहर आई तो हंगामा हो गया। क्योंकि पहले ही अरावली में अवैध खनन किया जा रहा है। रिपोर्टंस के मुताबिक अरावली के कई पहाड़ों को काटकर समतल कर दिया गया। लगभग 8% हिस्सा नक्शे से ही गायब हो गया। खनन से सरकार को हजारों करोड़ो का फायदा होता है इसलिए शायद सरकार भी अवैध खनन की तरफ आंखे मूंद लेती है। और अब इसी अवैध खनन को कानूनी जामा पहनाया जा रहा है। यानी अब तक जो अवैध खनन छिपकर चलते था उसके लिए अब बाकायदा सरकारी पट्टे बांटे जाएंगे।
आंदोलन की गूंज
अरावली से बनास, साबरमती, चंबल, लूणी और बेड़च जैसी कई नदियां निकलती है। सरिस्का, रणथम्भौर, कैलादेवी टाइगर रिजर्व इसी पर्वत माला का हिस्सा है। साथ ही अरावली कई प्रजातियों का घर भी है। अब जब आरावली उजाड़बा री बात आई तो हंगामों तो होणो ही हो। सोशल मीडिया पर #savearavli जैसे कीवर्ड लगाकर वीडियो बनाई जाने लगी। राजस्थान में आंदोलन की गूंज सुनाई देने लगी..

Save Aravali Hills: चिपको आंदोलन
राजस्थान देश का वो हिस्सा है जहा एक पेड़ को बचाने के खातिर अमृतादेवी विश्नोई जैसे 363 लोग शहीद हो गए। और अब तो बात पूरे पहाड़ की है।
‘भ्रम फैलाना बंद करें!’
इसी बीच केंद्र सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रेस कांफ्रेस की और कहा कि अरावली पर्वत श्रृंखला संरक्षित और सुरक्षित है- भ्रम फैलाना बंद करें! भूपेंद्र यादव खुद अरावली की गोद में बसे अजमेर से आते है।
एक तरफ बचाव, दूसरी तरफ सौदा
Save Aravali Hills: अक्सर देखा जाता है कि एक तरफ सरकार वन और पर्यावरण को बचाने की बात करती है वहीं दूसरी तरफ अंबानी-अडानी जैसे बिजनेस मेन से साथ खनन का सौदा करती है। लेकिन इस बार बात राजस्थान के गौरव की है..अगर अरावली को चीरा गया को तो उसकी आवाज दूर तक जाएगी।
