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लद्दाख के इस गांव में प्रेग्नेंट होने के लिए लगा रहता है महिलाओं का आना-जाना.. जानें क्या है 'प्रेग्नेंसी टूरिज्म'?

न्यूज़11 भारत रांची/डेस्क: लद्दाख की ठंडी वादियों और बर्फ से ढकी चोटियों के बीच एक अनोखी चर्चा ने अब लोगों का ध्यान खींच लिया है “प्रेग्नेंसी टूरिज्म”. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई विदेशी महिलाएं खास तौर पर जर्मनी से लद्दाख के कुछ गांवों में सिर्फ पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि यहां के पुरुषों से प्रेग्नेंट होने की इच्छा लेकर आती हैं.

लद्दाख के दाह, हनु और गरकोन जैसे सीमावर्ती गांवों में बसने वाला ब्रोक्पा समुदाय इस कहानी के केंद्र में हैं. इन्हें अक्सर भारत के “अंतिम आर्य” कहा जाता हैं. लंबे कद, गोरी त्वचा, हल्की आंखों का रंग और पारंपरिक फूलों से सजे परिधानों से ये आसानी से पहचाने जाते हैं. ब्रोक्पा समाज की खास बात यह है कि ये बौद्ध धर्म के साथ-साथ प्राचीन जीववादी (animist) मान्यताओं का पालन करते हैं. इनकी संस्कृति, भाषा और पहनावे में अब भी सैकड़ों साल पुरानी झलक देखने को मिलती हैं.

“शुद्ध आर्य वंश” की कहानियों ने बढ़ाई दिलचस्पी कई विदेशी वेबसाइटों और ब्लॉग्स में दावा किया गया कि ब्रोक्पा लोग सिकंदर महान की सेना के वंशज है, जो दो हजार साल पहले इस इलाके में बस गए थे. इसी दावे के कारण कुछ विदेशी महिलाएं, विशेषकर जर्मन नागरिक, इन गांवों की ओर आकर्षित हुई. यह मानते हुए कि यहां “शुद्ध आर्य वंश” का खून बहता हैं. हालांकि, इतिहासकार और वैज्ञानिक इन दावों को खारिज करते हैं. आधुनिक आनुवंशिक शोधों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि ब्रोक्पा सचमुच सिकंदर की सेना के वंशज हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक “आर्य जीन” जैसी धारणा औपनिवेशिक सोच का हिस्सा है, न कि कोई वैज्ञानिक तथ्य.

क्या वाकई होता है “प्रेग्नेंसी टूरिज्म”? “Pregnancy Tourism” का अर्थ आमतौर पर उन महिलाओं से होता है जो बच्चे के जन्म के लिए दूसरे देश जाती है ताकि नवजात को उस देश की नागरिकता मिल ससके, जैसे अमेरिका या कनाडा में होता है लेकिन लद्दाख का मामला बिल्कुल अलग बताया जा रहा हैं. यहाँ यह धारणा फैल गई कि कुछ विदेशी महिलाएं “आर्य” वंश को बनाए रखने के उद्देश्य से ब्रोक्पा पुरुषों के साथ संबंध बनाना चाहती हैं. स्थानीय समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं का कहना है कि यह सब कहानियों और कल्पनाओं का मेल हैं. लद्दाख के इन गांवों में विदेशी पर्यटक जरूर आते है लेकिन वे यहां की अनोखी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से आकर्षित होकर आते है, किसी “जीन संरक्षण” के लिए नहीं.

संस्कृति नहीं, मिथक हुआ वायरल स्थानीय लोगों का कहना है कि “आर्य गांव” की चर्चा ने पर्यटन को बढ़ावा जरूर दिया है, लेकिन इससे जुड़े मिथक अक्सर हकीकत से कोसों दूर हैं. सोशल मीडिया पर वायरल “प्रेग्नेंसी टूरिज्म” की कहानियां मनोरंजक तो है, मगर इनका कोई प्रमाणिक आधार नहीं.

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