भारत में 6 GHz बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर भारती

6 गीगाहर्ट्ज बैंड स्पेक्ट्रम को लेकर भारतीय टेलीकॉम और अमेरिकी टेक कंपनियां आमने - सामने

"6 गीगाहर्ट्ज बैंड स्पेक्ट्रम" को लेकर भारतीय टेलीकॉम और अमेरिकी टेक कंपनियां आमने - सामने

Jio, Airtel और वोडाफोन आइडिया की ट्राई से स्पेक्ट्रम नीलामी की मांग

अमेरिकी टेक कंपनियां बैंड Wi-Fi के लिए फ्री किये जाने के पक्षधर

नई दिल्ली।

भारत में "6 GHz" बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर भारतीय टेलीकॉम आपरेटर और अमेरिकी टेक दिग्गज कंपनियां आमने सामने आ गयी हैं। अमेरिका की बड़ी तकनीकी कंपनियों एपल, अमेजन, सिस्को, मेटा, एचपी और इंटेल कारपोरेशन ने रिलायंस जियो और वोडाफोन आइडिया की मोबाइल सर्विस के लिए 6 गीगाहर्ट्ज बैंड स्पेक्ट्रम देने की मांग का विरोध किया है। दूसरी तरफ भारतीय टेलीकाम आपरेटरों ने अमेरिकी दिग्गज कंपनियों Apple, Amazon, Meta, Intel और Cisco जैसे कंपनियों की मांग के खिलाफ ट्राई में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है।

Jio, Airtel और Vi (वोडाफोन आइडिया) 6 GHz बैंड की नीलामी की मांग कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर Apple, Amazon और Meta इस बैंड को Wi-Fi के लिए खुला छोड़ने की मांग कर रहे हैं। TRAI इस पर जल्द फैसला लेगा। यह फैसला भारत के अगले दशक की मोबाइल नेटवर्क रणनीति तय करेगा और 5G और आने वाले 6G नेटवर्क के भविष्य को सीधे प्रभावित करेगा।

Jio, Airtel और Vodafone Idea का कहना है कि ये विदेशी कंपनियां 6 GHz बैंड की नीलामी का विरोध करके इंडस्ट्री को आर्थिक नुकसान पहुंचा रही हैं। भारतीय टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि 5G की ग्रोथ और 6G की तैयारी के लिए यह बैंड जरूरी है और नीलामी से सरकार को बड़ा राजस्व भी मिलेगा। COAI ने साफ कहा है कि अगर यह बैंड Wi-Fi के लिए खोल दिया गया तो मोबाइल सेवाओं का भविष्य प्रभावित होगा और विदेशी OTT कंपनियों को फायदा मिलेगा। 

वहीं अमेरिकी दिग्गज चाहते हैं कि पूरा बैंड Wi-Fi के लिए फ्री कर दिया जाए, क्योंकि ग्लोबल लेवल पर मोबाइल नेटवर्क 6 GHz पर अभी तकनीकी रूप से तैयार नहीं हैं। इन कंपनियों ने TRAI को बताया है कि मोबाइल सर्विस के लिए यह बैंड अभी न तो Commercially और न ही Technically परिपक्व है। उनका तर्क है कि Wi-Fi को अतिरिक्त फ्री स्पेक्ट्रम मिलने से बेहतर इंटरनेट एक्सेस और सस्ते कनेक्टिविटी विकल्प मिलेंगे।   दूरसंचार नियामक ट्राई द्वारा इस संबंध में जारी एक परामर्श के जवाब में कंपनियों ने यह बात कही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने कम पावर एप्लिकेशन, खासकर वाईफाई के लिए निचले 6 GHz बैंड (5925-6425 MHz) को डीलाइसेंस (इसे आसानी से एक्सेस करने लायक बनाना) करने का फैसला किया है। सरकार ने कहा है कि 6 गीगाहर्ट्ज में 400 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी नीलामी के लिए उपलब्ध है। 300 मेगाहर्ट्ज 2030 तक उपलब्ध होगी और 500 मेगाहर्ट्ज को कम पावर वाले एप्लिकेशन यानी वाई-फाई सर्विस के लिए इस्तेमाल करने के लिए लाइसेंस की शर्तों से बाहर रखा जाएगा। हालांकि वोडाफोन आइडिया आदि ने आने वाले ऑक्शन में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध 400 MHz स्पेक्ट्रम को बेचने की मांग की है।

सरकार ने 6 GHz के निचले 500 MHz बैंड को पहले ही लो-पावर Wi-Fi के लिए फ्री करने का निर्णय लिया है। इसे लेकर टेलीकॉम कंपनियां चिंतित हैं। फिलहाल TRAI सभी पक्षों की सबमिशन की समीक्षा कर रहा है और अंतिम निर्णय आने वाले महीनों में लिया जाएगा। Jio पूरे 1200 MHz को तुरंत नीलामी के पक्ष में है, जबकि Vodafone Idea मौजूदा 400 MHz की नीलामी मांग रहा है। Airtel और Qualcomm का मत है कि भारत को ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुरूप आगे बढ़ना चाहिए और जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। यह फैसला तय करेगा कि अगले 10 साल में भारत की मोबाइल स्पीड और नेटवर्क कैपेसिटी कैसी होगी।

टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई के स्पेक्ट्रम ऑक्शन के अगले राउंड के कंसल्टेशन पेपर पर एक साथ जवाब देते हुए, US की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने कहा है, कि मोबाइल सर्विस के लिए 6 GHz बैंड में टेक्निकल और कमर्शियल तैयारी अभी पक्की नहीं है। इन कंपनियों के साझा अनुरोध पत्र में कहा गया है कि, "हम IMT के लिए 6425-6725 MHz और 7025-7125 MHz रेंज के किसी भी फ्यूचर ऑक्शन के लिए टाइमलाइन तय करने की सलाह नहीं देते हैं। TRAI को डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस के साथ मिलकर WRC-27 के नतीजों के बाद अपर 6 GHz बैंड के एलोकेशन का रिव्यू करना चाहिए। जिसमें 7.125-8.4 GHz से जुड़ा एजेंडा आइटम 1.7 भी शामिल है।"

यहां टेक जायंट्स ने कहा कि कोई भी अपर 6 GHz स्पेक्ट्रम जो बिना इस्तेमाल के रह जाएगा, उसे अंतरिम तौर पर बिना लाइसेंस के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

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