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रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, डॉलर के मुकाबले अपने निचले स्तर पर पहुंचा

रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, डॉलर के मुकाबले अपने निचले स्तर पर पहुंचा

Indian Economy : भारतीय रुपये में सोमवार को ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली। भारतीय मुद्रा बाजार में नयी गिरावट के साथ रूपया 89.76 के ऑल-टाइम लो पर पहुंच गया। दूसरी तिमाही में 8.2% की शानदार GDP ग्रोथ दर्ज होने के बावजूद रूपये में गिरावट देखने को मिल रही है।

मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया सोमवार को 89.76 पर पहुंच गया, जो 2 सप्ताह पहले 89.49 के पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर से भी नीचे है। हालांकि बाजार बंद होने तक रुपया महज 8 पैसे गिरकर US डॉलर के मुकाबले 89.53 (प्रोविजनल) पर बंद हुआ। फॉरेक्स ट्रेडर्स ने कहा कि रुपये में लगातार कमजोरी मुख्य रूप से बढ़ते ट्रेड डेफिसिट, भारत-US ट्रेड डील में देरी और सेंट्रल बैंक के सीमित दखल की वजह से है। "आने वाले दिनों में US डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बना रह सकता है। US डॉलर की डिमांड और सप्लाई के बीच अंतर के कारण शॉर्ट टर्म में, स्पॉट USD-INR को 89.95 पर रेजिस्टेंस और 89.30 पर सपोर्ट है। 

रूपये में गिरावट का कारण देश में कमजोर विदेशी निवेश, भारी व्यापार घाटा और की कई दौर की वार्ता के बाद भी U.S.-India ट्रेड डील न होने को माना जा रहा है। रूपये में इस गिरावट से देश का आयात खर्च बढ़ सकता है जो व्यापार घाटा और बढ़ा सकता है। रुपये का गिरना सीधे तौर पर हमारी आयात लागत (Import Costs) को बढ़ाएगा। तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, और विदेश में पढ़ाई जैसी चीजें महंगी हो जाएंगी। यह हर आम नागरिक की जेब पर असर डालेगा।

वैश्विक स्तर पर डॉलर के मुकाबले रुपया 2025 में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक रहा है। इसका प्रदर्शन केवल तुर्की लीरा और अर्जेंटीना पेसो से बेहतर रहा। 3 नवंबर से अब तक रुपए में लगभग 90 पैसे की गिरावट आ चुकी है, जिससे आयात महंगा होने का खतरा बढ़ गया है। कुछ हफ्तों पहले रुपया ने 89.49 के लेवल पर रिकॉर्ड लो बनाया था। यूरो के मुकाबले यह 102.32 से 103.63, ब्रिटिश पाउंड के सामने 116.08 से 118.27, और जापानी येन के मुकाबले 0.5642 से 0.5720 तक गिर गया।

न्यूज एजेंसी "रायटर्स" की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले महीने अमेरिकी और भारतीय अधिकारियों की टिप्पणियों से यह उम्मीद जगी थी कि भारतीय निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ दरों में जल्द ही कमी की जाएगी, लेकिन किसी ठोस समझौते के अभाव ने रुपये को नुकसान हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था एक तरफ मजबूत आर्थिक वृद्धि की इशारा कर रहा है। वहीं, दूसरी तरफ रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। यह बात थोड़ी चौंकाने वाली है। दरअसल, आमतौर पर अच्छे इकोनॉमी ग्रोथ से किसी भी देश की करेंसी मजबूत होती है। हाल ही में जारी हुए डेटा के अनुसार, देश की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) ग्रोथ दूसरी तिमाही में 8.2% रही, जो उम्मीद से कहीं ज्यादा थी। लेकिन, इस अच्छी खबर का रुपये पर कोई खास असर नहीं दिखा।

बैंकर्स और इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि इस मजबूती के बावजूद रुपये को इसलिए राहत नहीं मिल रही है, क्योंकि भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर कोई खास प्रोग्रेस नहीं दिख रहा है। टैरिफ टेंशन भी विदेशी निवेशकों का भरोसा को तोड़ रहे हैं।

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