दुर्गा पूजा 2025: सिंदूर खेला की रस्म और इसका सदियों पुराना महत्व
न्यूज़11 भारत रांची/डेस्क: दुर्गा पूजा का पर्व पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, झारखंड और बांग्लादेश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. पश्चिम बंगाल में, यह पर्व षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विजयादशमी के पांच दिनों तक चलता है, जिसमें बंगाली समुदाय के लोग कई विशेष रस्में और परंपराएं निभाते हैं. इन्हीं रस्मों में से एक है सिंदूर खेला.
सिंदूर खेला: अखंड सौभाग्य की कामना सिंदूर खेला की रस्म में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं. यह रिवाज दुर्गा पूजा उत्सव का एक बेहद खास और भावनात्मक हिस्सा है.
400 साल पुरानी परंपरा ऐसी मान्यता है कि सिंदूर खेला की परंपरा लगभग 400 साल पुरानी है. इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ स्थानीय हिस्सों में हुई थी. समय के साथ, यह परंपरा भारत के अन्य हिस्सों में भी पहुंची और आज विजयादशमी के उत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है.
कैसे निभाई जाती है सिंदूर खेला की रस्म? सिंदूर खेला के दौरान, बंगाली महिलाएं पारंपरिक साड़ियों और आभूषणों से सजकर देवी दुर्गा की पूजा करती हैं. वे सबसे पहले मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर लगाती हैं. इसके बाद, सभी विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं. इसके अतिरिक्त, भक्त पान का पत्ता अपनी हथेलियों में लेकर उसे देवी के चेहरे से स्पर्श कराती हैं, जो मां के चेहरे से आंसू पोंछने का प्रतीक माना जाता है. इसके बाद देवी को विदाई दी जाती है.
मायके से ससुराल विदाई का भाव यह माना जाता है कि नवरात्र के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और दशमी तिथि पर मायका छोड़कर ससुराल वापस जाती हैं. इसलिए, मां की विदाई से पहले सबसे पहले उनके माथे पर सिंदूर लगाया जाता है. साथ ही, उन्हें चूड़ियां (शाखा और पोला) पहनाई जाती हैं और मिठाई चढ़ाई जाती है. इसके बाद, विवाहित महिलाएं आपस में एक-दूसरे के माथे और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं और मिठाई खिलाकर एक-दूसरे के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएं देती हैं.
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