चक्रवात ‘मोंथा’ ने बरसाया कहर! चार दिन की बारिश से बर्बाद हुई फसल
पंकज कुमार/न्यूज़11 भारत गुमला/डेस्क: घाघरा थाना छेत्र में चार दिन से लगातार हो रही झमाझम बारिश ने गुमला जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के किसानों की कमाई पर गहरी चोट दी है. चक्रवात ‘मोंथा’ के प्रभाव से हुई इस अप्रत्याशित बरसात ने खेतों में खड़ी धान और मटर की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है, जहां एक ओर खेतों में पानी भर जाने से धान की बालियां झुक गईं है और गिर गई फसलें सड़ने लगी हैं. वहीं दूसरी ओर मटर की नाजुक पौध गलने लगी है. धान कटनी के ठीक पहले आई इस बे-मौसम बारिश से किसानों की सालभर की मेहनत पर पानी फिर गया. किसान सुमई उरांव बताते है कि इस साल लगातार अच्छी धूप और समय पर सिंचाई के कारण उन्होंने बेहतर पैदावार की उम्मीद की थी लेकिन चार दिनों से जारी वर्षा ने खेतों में जलजमाव कर सब कुछ बर्बाद कर दिया. उनका कहना है कि अब खेतों से जो भी फसल निकलेगी, वह बाजार में औने-पौने दाम पर ही बिक सकेगी. उसी तरह बिशुन साव, जो हर साल धान के साथ मटर की खेती करते हैं. बताते है कि मटर की फसल अभी अंकुरण की अवस्था में थी और लगातार नमी के कारण पौध गलने लगी है. उन्होंने आगे कहा कि बारिश से न सिर्फ फसलों को नुकसान हुआ है बल्कि खेतों में पहुंचने के रास्ते भी कीचड़ से भर गए है, जिससे खेतों की निगरानी तक मुश्किल हो गई है. कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारियों ने भी माना है कि इस बार की बारिश ने खरीफ फसलों को गहरी क्षति पहुंचाई है. अधिकारी बताते है कि जिन खेतों में अभी भी पानी नहीं भरा है. वहां किसान उचित जलनिकासी और पौधों में छिड़काव कर फसल को आंशिक रूप से बचा सकते हैं. विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे जल्द से जल्द खेतों का जल निकास सुनिश्चित करें ताकि सड़न की संभावना कम हो सके.
घाघरा प्रखंड के किसान अब सरकार से मुआवजे की उम्मीद कर रहे हैं ताकि हुए नुकसान की भरपाई हो सके. किसानों के चेहरों पर निराशा साफ झलक रही है. इस बार वे अच्छी फसल के बाद उपज का बेहतर दाम मिलने का सपना देख रहे थे, जिससे परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें परंतु बे-मौसम वर्षा ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. कई किसानों ने बताया कि वे साहूकारों या बैंक से लिए कर्ज को कैसे चुकाएंगे, यह सोचकर चिंता में है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की अनियमित मौसमी बारिश अब सामान्य होती जा रही है. वे किसानों को सलाह देते हैं कि वे फसल विविधीकरण, जल निकासी की स्थायी व्यवस्था, और वैज्ञानिक पद्धति से खेत प्रबंधन पर ध्यान दें, ताकि भविष्य में ऐसा नुकसान कम हो सके. फिलहाल गांवों में किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए है कि बारिश थमे और खेत सूखें, जिससे जो कुछ बचा है, उसे संभाल सकें.
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