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एक देश‑एक चुनाव’ JPC बैठक में आज: विशेषज्ञ रखेंगे अपनी राय
दो हाई‑प्रोफाइल विशेषज्ञ रखेंगे अपनी राय
आज का दिन ऐसा है जैसे कोई ज़रूरी मोड़ हो जाए राह में। “एक देश‑एक चुनाव” के नाम पर बने 39 सदस्यीय JPC की छठी बैठक है। जहाॅँ 15वें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह और Ashoka University की Prof. Dr. Prachi Mishra अपना मान‑मंथन साझा करेंगे।विशेषज्ञों के विचार और न्यायपालिका
एनके सिंह का नजरिया
एनके सिंह, जो 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे हैं, वे अर्थव्यवस्था, संसाधनों और संविधानिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की कला जानते हैं। उनका कहना है "क्षमता और दक्षता की दृष्टि से एक साथ चुनाव होना संभव है, पर यह तय करने से पहले संसदीय प्रक्रिया, राज्यों की स्वायत्तता व चुनाव आयोग की भूमिका को स्पष्ट रूप से देखना होगा।" जब आप किसी फैसले की बात करते हो, तो वित्त आयोग जैसे संस्थानों की राय लेना मानो इशारा होता है कि यह देश की राजनीति ही नहीं, अर्थव्यवस्था को भी छूने वाला निर्णय है।Prof. Prachi Mishra की राय
प्राची मिश्रा, Ashoka University के Isaac Centre for Public Policy की निदेशक, गुंजाइशों को समझने की अकड़धारटी नहीं पर सवालों की तेज धार जरूर रखती हैं। उनका जोर संविधान की मूल संरचना और लोकतांत्रिक अधिकारों पर है। वे कहती हैं "बिल से देश को लाभ ही नहीं, लोकतंत्र को भी मजबूती मिलेगी अगर चुनाव आयोग की शक्तियों और रिलीज नियमों में स्पष्टता हो।" उनकी बातों में एक तरह की मानवता छिपी होती है यही वजह है कि JPC में आम जनता की राय लेने के फैसले में उनका योगदान अहम माना जा रहा है।पूर्व CJI का प्रभाव अभी भी कायम
5वीं बैठक में शामिल पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने पहले स्पष्ट किया था कि यह बिल संविधान की मूल संरचना को प्रभावित नहीं करता। पर साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग की शक्ति को लेकर चिंताएं भी जताईं उन्होंने कहा "यह केवल तर्क नहीं, जवाबदेही का मसला है," जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने समर्थन करते हुए कहा कि विधानसभा के कार्यकाल में बदलाव का फैसला सिर्फ संसद के पास होना चाहिए, न कि चुनाव आयोग के हाथ में। ऐसे सुझावों ने JPC की दिशा को संवैधानात्मक ढांचे में बांध दिया। [caption id="attachment_65020" align="alignnone" width="640"]लोकतंत्र, जवाबदेही और सवालों की लड़ाई
आज जब एनके सिंह और प्राची मिश्रा JPC के सामने अपनी राय रखेंगी, तो सवाल सिर्फ टेक्स्ट या प्रेजेंटेशन का नहीं यह हो सकता है एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का निर्णायक क्षण।- क्या यह बिल खर्च कम करेगा या लोकतंत्र में सेंध लगाएगा?
- क्या चुनाव आयोग की शक्तियाँ संविधान की जिम्मेदारी से आगे बढ़ जाएँगी?
- सबसे बड़ी बात यदि जनता की राय को सच में महत्व मिला, तो यह निर्णय सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगी।