देश-विदेश
अमेरिकन F-35 : भारत ने फाइटर जेट खरीदने से पहले रखी शर्त?
सस्ते रूस के Su-57 और देश में बनेगा तो लेंगे, वरना नहीं
अमेरिका का F-35 फाइटर जेट — दुनिया का सबसे आधुनिक, सबसे महंगा और सबसे चर्चित लड़ाकू विमान। फिर भी भारत ने इसे खरीदने से साफ इनकार कर दिया। क्योंकि भारत अब ‘ग्राहक’ नहीं, साझेदार बनना चाहता है। वो दौर बीत चुका है जब हम सिर्फ हथियार खरीदते थे। आज भारत चाहता है कि जो भी हथियार आएं, वो यहीं बनें, यहां के युवाओं को रोजगार दें, और देश की आत्मनिर्भरता को मजबूती दें।क्या है पूरा मामला?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अमेरिकी अधिकारियों को साफ कर दिया है कि उसे F-35 में कोई दिलचस्पी नहीं है — खासकर जब यह विमान भारत में बनकर तैयार न हो। इससे पहले ट्रम्प प्रशासन ने फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी को यह फाइटर जेट ऑफर किया था। फिर अप्रैल में अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी F-35 की बिक्री की पेशकश की। लेकिन भारत ने इस पर सहमति नहीं दी। कारण?- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं
- देश में उत्पादन की अनिच्छा
- अमेरिकी टैरिफ पॉलिसी से नाराजगी
25% टैरिफ और ‘डेड इकोनॉमी’ वाला ताना
1 अगस्त को ट्रम्प ने भारत से आने वाले सामानों पर 25% टैरिफ लगाने का ऐलान किया। साथ ही, भारत और रूस को “डेड इकोनॉमी” बताकर एक तरह से भारत की नीतियों का मजाक उड़ाया। अब बताइए, जब कोई देश इस तरह आपकी आर्थिक ताकत को कम करके आंकता है, तो क्या आप उससे अरबों डॉलर का डिफेंस डील करेंगे? भारत ने नहीं किया। और यही आत्मसम्मान की राजनीति है।विकल्प क्या है? रूस का Su-57
भारत के सामने जो सबसे मजबूत विकल्प है, वो है रूस का Su-57। ये भी एक 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है, लेकिन कीमत में लगभग F-35 से आधा।- F-35 की कीमत: ₹715 करोड़
- Su-57 की कीमत: ₹325 करोड़
अब भारत क्या चाहता है?
भारत अब ‘खरीदार देश’ से ‘निर्माता राष्ट्र’ बनना चाहता है। वो देश जहां:- फाइटर जेट्स का निर्माण हो
- युवा इंजीनियर काम करें
- रक्षा क्षेत्र में टेक्नोलॉजी आए
- दुनिया हमें सिर्फ ग्राहक नहीं, पार्टनर माने
क्या यह फैसला सही है?
सकारात्मक पक्ष देखें तो
- आत्मनिर्भरता को बल मिलेगा
- विदेशी कंपनियों पर निर्भरता घटेगी
- स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा
- रूस के साथ भरोसेमंद संबंध और गहरे
नुकसान देखें तो
- अमेरिका से रणनीतिक दूरी बढ़ सकती है
- क्वालिटी और टेक्नोलॉजी का अंतर
- चीन जैसी चुनौतियों में अमेरिका का सहयोग कम हो सकता है