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27 दिन में PM ने इस्तीफा दे दिया: फ्रांस में मची सियासी भूचाल, मैक्रों पर बढ़ा दबाव

 क्या ले पेन बनेंगी अगली राष्ट्रपति? 

 फ्रांस का लोकतंत्र डगमगाता क्यों दिख रहा है?

“क्या ऐसा हो सकता है कि एक देश का प्रधानमंत्री महज 27 दिन में इस्तीफा दे दे?” फ्रांस में यही हुआ है। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू, जिन्हें बड़ी उम्मीदों और वादों के साथ 9 सितंबर को नियुक्त किया गया था, 6 अक्टूबर को ही इस्तीफा दे चुके हैं। 13 महीने में चौथे प्रधानमंत्री का जाना सिर्फ राजनीतिक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक गहरी लोकतांत्रिक समस्या का संकेत है।

राजनीति या तमाशा?

फ्रांस, जो कभी यूरोप की स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में गिना जाता था, अब सियासी अस्थिरता का शिकार हो चुका है। संसद में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं है—न मैक्रों के गठबंधन को, न वामपंथ को और न ही दक्षिणपंथ को। ऐसे में जब लेकोर्नू ने नई कैबिनेट की घोषणा की, तो न सिर्फ विपक्ष भड़का, बल्कि खुद मैक्रों की सहयोगी पार्टियां भी नाराज़ हो गईं। “नई शुरुआत” का वादा खोखला लगने लगा।

क्या हुआ जो इस्तीफा देना पड़ा?

असल में लेकोर्नू को एक बेहद कठिन काम सौंपा गया था — सरकारी खर्च घटाना और घाटा नियंत्रित करना। लेकिन जैसे ही उन्होंने कदम आगे बढ़ाया, उन्हें चारों ओर से विरोध का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ा विवाद तब भड़का जब लंबे समय तक इकोनॉमी मिनिस्टर रहे ब्रूनो ले मायेर को अचानक डिफेंस मिनिस्टर बना दिया गया। Read More:- जिंदगी में होना है सफल तो घर के वास्तु में करें छोटा सा बदलाव

विपक्ष ने किया वार, मांग उठी -  मैक्रों इस्तीफा दें

मरीन ले पेन, जो 2027 में राष्ट्रपति बनने की दौड़ में सबसे आगे मानी जा रही हैं, ने मांग की कि राष्ट्रपति मैक्रों को खुद इस्तीफा देना चाहिए। वामपंथी गठबंधन ने भी इसी बात को दोहराया। लेकिन मैक्रों डटे हुए हैं — उनका कहना है कि वो 2027 तक पद नहीं छोड़ेंगे।

अब आगे क्या? तीन रास्ते, तीनों मुश्किल

  1. नया प्रधानमंत्री नियुक्त करना — लेकिन कौन? अपने खेमे में विकल्प नहीं, और बाहर से चुनने पर असहमति तय है।
  2. संसद भंग कर दोबारा चुनाव — लेकिन इससे नेशनल रैली (RN) को बहुमत मिलने का खतरा, जिससे मैक्रों की सबसे बड़ी हार हो सकती है।
  3. खुद इस्तीफा देना — फिलहाल इससे उन्होंने इनकार कर दिया है।

फ्रांस के लिए क्या मतलब है ये सब?

फ्रांस का राजनीतिक संतुलन अब झूलता हुआ दिखाई दे रहा है। जनता का भरोसा डगमगा रहा है, युवा वर्ग भ्रम में है और आर्थिक चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। अगर अगली सरकार स्थिर नहीं बनती, तो यह सिर्फ फ्रांस ही नहीं, यूरोप की राजनीति पर भी असर डालेगा। Read More:- क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी सुबह की शुरुआत कैसी होनी चाहिए?