देश-विदेश
ECI की राज्य अधिकारियों के साथ बैठक, देशभर में वोटर्स वेरिफिकेशन कराने पर चर्चा।
क्या आपका नाम वोटर लिस्ट से ग़ायब हो गया है?
नाम कटने का डर, पहचान फिर से साबित करनी पड़ेगी
मुज़फ्फरपुर के रमेश यादव, 58 साल के हैं। पिछले 30 सालों से हर चुनाव में वोट डालते आए हैं। मगर इस बार BLO ने घर आकर पूछा "आप भारतीय नागरिक हैं, इसका सबूत है आपके पास?"रमेश जी अवाक रह गए। "क्या अब फिर से अपनी पहचान साबित करनी होगी?"
यह सिर्फ रमेश जी की कहानी नहीं है। देशभर में करोड़ों लोग इस असमंजस में हैं कि कहीं उनका नाम वोटर लिस्ट से न कट जाए।
आधार है पहचान, मगर नागरिकता नहीं!
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि आधार पहचान है, नागरिकता नहीं। और यहीं से शुरू हुआ असली सवाल क्या भारत के नागरिकों को बार-बार अपने वजूद का सबूत देना जरूरी है? जो लोग 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे हैं, उन्हें अब जन्म प्रमाणपत्र, जन्मस्थान और माता-पिता की पहचान तक देनी होगी। ज़रा सोचिए, गांव के किसी बुज़ुर्ग से पूछिए कि
वो 1987 में कहां पैदा हुए थे?
काग़ज़ कहां से लाएंगे?
उद्देश्य अच्छा, पर असर आम आदमी पर
चुनाव आयोग कहता है कि ये प्रक्रिया फर्जी वोटरों और अवैध प्रवासियों को हटाने के लिए जरूरी है। लेकिन इसकी आड़ में कहीं असली नागरिकों को ही परेशान तो नहीं किया जा रहा?
इसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ा है जिनके पास सीमित दस्तावेज़ हैं मज़दूर, ग्रामीण, बुज़ुर्ग, महिलाएं।
इंसानी नज़रिया भी जरूरी है
हर नीति के पीछे एक मकसद होता है, लेकिन अगर इंसान की गरिमा और आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचे, तो उस नीति की आत्मा खो जाती है। आखिर एक लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि वह हर नागरिक को बराबरी से देखे फिर वो किसी भी जाति, वर्ग, क्षेत्र या पहचान का क्यों न हो।
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SIR एक अहम कदम हो सकता है, लेकिन इसे सहानुभूति और समझदारी के साथ लागू किया जाना चाहिए। नहीं तो चुनाव वाले दिन जब लाखों लोग बूथ पर पहुंचेंगे और उनका नाम लिस्ट में नहीं होगा, तब ये एक नीतिगत बदलाव नहीं, एक सामाजिक त्रासदी बन जाएगी।Watch Now :- US ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया