देश-विदेश
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन चुनाव से ठीक पहले क्यों?
बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा: क्या हटेंगे लाखों नाम?
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। इस मुद्दे पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने चुनाव आयोग से कई कड़े सवाल पूछे। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आयोग नियमों को ताक पर रखकर नागरिकों से उनकी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज मांग रहा है, जो संविधान और कानून के खिलाफ है।क्या है मामला?
बिहार में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) शुरू किया है। इस प्रक्रिया के तहत नागरिकों से पहचान और नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। इस पर आपत्ति जताते हुए RJD सांसद मनोज झा, TMC सांसद महुआ मोइत्रा सहित 11 नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि वोटर लिस्ट रिवीजन में नागरिकता की जांच करना गृह मंत्रालय का कार्यक्षेत्र है, चुनाव आयोग का नहीं। अदालत ने यह भी पूछा कि अगर यह प्रक्रिया जरूरी थी, तो इसे चुनाव से कुछ महीने पहले ही क्यों नहीं पूरा किया गया?याचिकाकर्ताओं के बड़े सवाल
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और गोपाल शंकर नारायणन ने कोर्ट में तीन बड़े मुद्दे उठाए:- 11 दस्तावेज माने जा रहे हैं, लेकिन आधार कार्ड और वोटर ID को अमान्य बताया जा रहा है, जबकि ये सबसे महत्वपूर्ण पहचान पत्र हैं।
- 2003 की लिस्ट में शामिल व्यक्ति को रियायत, लेकिन नए मतदाताओं से भारी दस्तावेजी सबूत की मांग। यह असमान और अस्पष्ट प्रक्रिया है।
- अगर यह सघन पुनरीक्षण प्रक्रिया है, तो अधिकारियों को हर घर जाकर जानकारी इकट्ठा करनी चाहिए, जो अभी नहीं हो रहा।
EC की दलील और कोर्ट का जवाब
EC की ओर से पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने पक्ष रखा। उनका कहना था कि सिर्फ आधार कार्ड से नागरिकता सिद्ध नहीं की जा सकती।इस पर कोर्ट ने कहा, "अगर आप सिर्फ नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट में नाम जोड़ रहे हैं, तो यह बड़ी कसौटी बन जाएगी। यह गृह मंत्रालय का विषय है, चुनाव आयोग इसमें न पड़े।"