ताकत इरादों से बनती है, कड़ी मेहनत से बड़ी कोई दवा नहीं
पंजाब के गुरदासपुर जिले के एक छोटे से गाँव में जन्मा एक साधारण लड़का वरिंदर घुम्मन
पंजाबी युवाओं के लिए उनका संदेश था, माता-पिता की आँखों में आँसू नहीं, गर्व पैदा करो
घर के हालात ने बड़ा होने नहीं दिया, लेकिन उसने अपने हौसले को कम भी होने नहीं दिया
“शरीर ईश्वर का दिया तोहफ़ा है, मैं इसे साफ़ रखूँगा, जो भी करूँगा–ईमानदारी से करूँगा”
मिस्टर यूनिवर्स मंच पर खड़े होकर दुनिया को बताया, “ताकत मांस में नहीं, मेहनत में होती है
जालंधर
ये कहानी है पंजाब की धरती से उठे एक ऐसे युवक की… जिसने दुनिया को बताया कि ताकत इरादों से बनती है। लोग कहते थे – “शरीर मांसाहार से बनता है।” लेकिन उसने साबित कर दिया – शरीर कड़ी मेहनत… और विश्वास से बनता है। यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं है – यह पंजाबी मिट्टी की खुशबू है। यह सच्ची मेहनत की ताकत है। यह दुनिया के पहले पेशेवर बॉडी बिल्डर वीरेंद्र सिंह घुमन की कहानी है – एक शाकाहारी शेर। पंजाब के गुरदासपुर जिले के एक छोटे से गाँव में जन्मा एक साधारण लड़का – वरिंदर। न कोई बड़ा शहर, न कोई बड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि। न विशेष सुविधाएँ… लेकिन एक बड़ा सपना – स्वस्थ और मजबूत बनना। नशे में डूबे पंजाबी युवाओं के लिए उनका संदेश था – “नशा नहीं – जिम ज्वाइन करो। माता-पिता की आँखों में आँसू नहीं – गर्व पैदा करो। कड़ी मेहनत से बड़ी कोई दवा नहीं है।
जब पहली बार खुद जिम गया
बचपन से ही खेलों के प्रति प्रेम। किसी दिन कप जीतने के लिए नहीं – खुद को जीतने का जुनून। घर की हालत ने उसे बड़ा होने नहीं दिया, लेकिन उसने अपने हौसले को कम होने नहीं दिया। जब उसने पहली बार जिम में कदम रखा – लोग हँसे: “क्या एक गाँव का लड़का बॉडीबिल्डर बनेगा?” “अलविदा, बिना मांसाहार के वह कैसे बनेगा?” लेकिन वीरेंद्र ने धीमी आवाज़ में एक बात कही… “मेरा शरीर ईश्वर का दिया हुआ तोहफ़ा है, मैं इसे साफ़ रखूँगा। मैं जो भी करूँगा – ईमानदारी से करूँगा।”
कंधा छोटा है, नहीं कर सकता
जबकि दूसरे लोग जिम में आकर अपना शरीर ठीक कर रहे थे… वीरेंद्र कड़ी मेहनत करने आया था। काम किया – चुपचाप। सीखा – ध्यान से। नियमित रूप से व्यायाम किया। किसी ने कहा – “मैं यह नहीं कर सकता, कंधा छोटा है।” किसी ने कहा – “प्रोटीन लिए बिना कुछ नहीं होता।” किसी ने डाँटा – “गाँव वालों, यह चक्कर छोड़ो।” लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया… क्योंकि वह जानता था – जवाब बातों से नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत से मिलता है।
दिन बदले, मेहनत से जवाब
उसने कहा – “मैं एक सिख हूँ… मेरा अनुशासन ही मेरी ताकत है। मेरा खून मेरे गुरुओं के आशीर्वाद से गर्म होता है, स्टेरॉयड से नहीं।” उसने शाकाहारी बॉडीबिल्डिंग को चुना। और यह कोई आसान फैसला नहीं था – यह एक विद्रोह था। उस ग़लतफ़हमी के ख़िलाफ़ विद्रोह – “मांसाहार के बिना शरीर नहीं बनता।” दिन बदले। मौके आए। और फिर एक दिन आया – उन्होंने अपनी पहली बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप जीती।
ताकत मांस में नहीं, मेहनत में
और फिर बॉडीबिल्डिंग का सबसे बड़ा खिताब – मिस्टर यूनिवर्स – आया। उस मुकाम तक पहुँचना ही अपने आप में एक बड़ी जीत है। लेकिन वीरेंद्र के लिए, यह सिर्फ़ एक प्रतियोगिता नहीं थी – यह पंजाब की धरती का सवाल था। यह इरादों की लड़ाई थी। ट्रॉफी उनके लिए कोई ख़ास नहीं थी – ख़ास बात यह थी कि उन्होंने उस मंच पर खड़े होकर दुनिया को बताया— “ताकत मांस में नहीं, मेहनत में होती है।
शरीर ईमानदारी से बनता है
असली शरीर जिम में नहीं – दिल में बनता है।” सफलता के बाद भी उनका दिल अब भी पंजाब की धरती में बसता था। न कोई अहंकार, न कोई दिखावा। वे कहते थे – “मैं जहाँ से आता हूँ… लोग आज भी मुझे वीरेंद्र कहते हैं, स्टार नहीं। मैं आज भी अपनी माँ के हाथ की रोटी खाता हूँ – और अपने गुरु साहिब के आगे शीश झुकाता हूँ।” वे कहा करते थे – “शरीर ईमानदारी से बनता है। अगर तुम धोखा दोगे – तो धोखा वापस आएगा। कड़ी मेहनत से अर्जित शक्ति ही सबसे शुद्ध शक्ति है।”
विचार कभी खत्म नहीं होते
बीती रात अमृतसर में इस शेरदिल बाडीबिल्डर की अचानक मौत हो गई। उनकी मौत की खबर ने सबको सन्न कर दिया। पहले राजवीर जवंदा अब वरिंदर घुम्मन। “जीवन में, शरीर हमेशा हमारे साथ नहीं रहता… लेकिन किया गया काम, दी गई प्रेरणा और कड़ी मेहनत की विरासत – कभी नहीं मरती। वीरिंदर सिंह घुमन सिर्फ़ एक बॉडी बिल्डर नहीं हैं – वे एक विचार हैं। और विचार कभी खत्म नहीं होते।”