MP सरकार की संपत्तियों की बिक्री में गड़बड़ी, 44 रजिस्ट्रियों में स्टाम्प चोरी का खुलासा
mp government properties sale: पांच साल में 123 सरकारी संपत्तियों की बिक्री
लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग के मुताबिक वर्ष 2022 से फरवरी 2025 के बीच मध्यप्रदेश सरकार की कुल 123 संपत्तियां बेची गईं. इनमें से 63 संपत्तियों की रजिस्ट्री में मुद्रांकन सही पाया गया, लेकिन 44 मामलों में खरीदारों ने स्टाम्प और पंजीयन शुल्क कम जमा किया.इसके अलावा 16 रजिस्ट्रियां ऐसी हैं, जिनमें अभी शुल्क की गणना का परीक्षण विभाग स्तर पर जारी है. यानी आने वाले दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ भी सकता है,
mp government properties sale: कैसे हुई स्टाम्प शुल्क की चोरी
विधानसभा को दी गई जानकारी में बताया गया कि कई मामलों में खरीदारों ने एक ही सरकारी संपत्ति को टुकड़ों में दिखाकर पंजीयन के दस्तावेज पेश किए. पंजीयन अधिकारियों ने उनके सामने प्रस्तुत विलेख के आधार पर अलग-अलग रजिस्ट्रियां कर दीं.हालांकि विभाग का दावा है कि इस प्रक्रिया में अलग-अलग गाइडलाइन लगाकर शुल्क चोरी का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है. इसी आधार पर पंजीयन अधिकारियों को दोषी नहीं माना गया।44 में से 15 मामलों में वसूली पूरी
स्टाम्प एवं पंजीयन शुल्क में कमी वाले 44 मामलों में से 15 रजिस्ट्रियों में पूरी वसूली हो चुकी है. शेष 29 मामलों में वसूली की कार्रवाई अभी प्रचलन में है, जबकि 16 मामलों में शुल्क गणना की जांच जारी है.विभाग के अनुसार दस्तावेजों के परीक्षण के बाद भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 की संबंधित धाराओं के तहत कलेक्टर ऑफ स्टाम्प द्वारा प्रकरण दर्ज किए गए हैं।ग्वालियर सबसे आगे, इंदौर सबसे पीछे
सरकारी संपत्तियों की बिक्री में जिलेवार आंकड़े भी चौंकाते हैं. ग्वालियर में सबसे ज्यादा 22 संपत्तियां बेची गईं, जबकि इंदौर में सिर्फ एक संपत्ति का ही विक्रय हुआ.अन्य जिलों में स्थिति कुछ इस तरह रही भोपाल 4, जबलपुर 3, उज्जैन 5, सागर 5, नरसिंहपुर 19, भिंड 6, गुना 7, मंदसौर 4, श्योपुर 5, रतलाम 3, देवास 1, धार 1, खंडवा 1, खरगौन 2, रायसेन 1, राजगढ़ 4, सतना 1, शहडोल 1, सिंगरौली 1, सूची लंबी है और आंकड़े बताते हैं कि मामला सिर्फ एक-दो जिलों तक सीमित नहीं है।
गड़बड़ी हुई, लेकिन कार्रवाई नहीं
जब स्टाम्प और पंजीयन शुल्क में गड़बड़ी सामने आई, तो जिम्मेदार कौन? इस पर विभाग का साफ कहना है कि किसी भी कलेक्टर ऑफ स्टाम्प, जिला पंजीयक या उप पंजीयक की जानबूझकर भूमिका संदिग्ध नहीं पाई गई.इसीलिए पंजीयन अधिकारियों पर किसी तरह की कार्रवाई का सवाल नहीं उठता. हालांकि राजस्व नुकसान जरूर हुआ, और उसकी भरपाई की प्रक्रिया अब भी जारी है।