उज्ज्वला योजना के तहत ₹300 की सब्सिडी जारी रहेगी

जब सब्सिडी सिर्फ सरकारी योजना नहीं, घर की रसोई की सांस बन जाती है, कुछ बातें कागज़ पर छोटी लगती हैं, लेकिन जब ज़िंदगी के अंदर उतरती हैं, तो उनकी गूंज बहुत गहरी होती है। ₹300 की सब्सिडी सुनने में साधारण सी राशि लगती है, न? आजकल तो शहरों में यही पैसे एक अच्छे कॉफी शॉप की दो कप लैटे पर खर्च हो जाते हैं। लेकिन देश के उस हिस्से में जहां रोटी अब भी लकड़ी जलाकर पकाई जाती है, ये ₹300 सिर्फ एक छूट नहीं है ये हक है, राहत है, और कभी-कभी उम्मीद का आखिरी सिरा भी।
मम्मी, गैस कब आएगी?”
मुझे याद है, कुछ साल पहले मैंने एक गांव की महिला से बात की थी। नाम था – शांति देवी, उम्र करीब 45 साल, लेकिन चेहरा समय से बहुत आगे निकल चुका था। उनके घर में उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन तो आया था, लेकिन हर महीने सिलेंडर भरवाना उनकी औकात से बाहर था। वो बोली, बिटिया कहती है, धुएं से उसकी आंख जलती है। लेकिन गैस भरवाऊं तो राशन कैसे लाऊं?”
उस दिन समझ आया कि सब्सिडी का मतलब सिर्फ आंकड़े नहीं होते। वो असल में उन बच्चों की आंखें हैं जो अब धुएं में नहीं जलतीं, उन औरतों की पीठ है जो अब घंटों लकड़ी नहीं बीनतीं, और उन रोटियों की गरमाहट है जो अब जल्दी और सुरक्षित पकती हैं।
सरकार का फैसला, रसोई का भरोसा
8 अगस्त को केंद्र सरकार ने जो ऐलान किया कि उज्ज्वला योजना के तहत ₹300 की सब्सिडी जारी रहेगी, वो कागज़ों पर एक और सरकारी कदम है। लेकिन जरा सोचिए जब बाजार में गैस सिलेंडर 900-1000 रुपए का हो, और सरकार इसमें ₹300 कम कर दे, तो ये किसी के महीने भर की दाल-चावल जितना फर्क पैदा कर देता है।

यह कोई लक्ज़री स्कीम नहीं है। यह ज़रूरत की जमीन से जुड़ी स्कीम है। इस पर खर्च होने वाला ₹12,000 करोड़ रुपया उस करोड़ों महिलाओं के जीवन में सीधे पहुंचता है, जिनके हाथों की लकीरें अब रोटी से नहीं, आत्मनिर्भरता से बनती हैं।
ये सब्सिडी, सिर्फ सब्सिडी नहीं है
ये उस बेटी का चेहरा है जो मां से अब कह सकती है “गैस पर मैगी बनाऊं?” ये उस दादी की राहत है जो अब हर बार खाना बनाते वक्त खांसती नहीं। ये उस पिता की चिंता कम करता है जिसे अब यह तय नहीं करना पड़ता कि बच्चों की फीस दें या गैस भरवाएं। कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो जीडीपी नहीं, दिलों को छूते हैं। ये वही है।
कभी-कभी 300 रुपए भी क्रांति ला सकते हैं
हो सकता है, कोई शहरी विश्लेषक कहे कि सरकार इस स्कीम पर बहुत खर्च कर रही है। लेकिन सच कहूं? कभी-कभी ये खर्च नहीं, निवेश होता है। एक ऐसी पीढ़ी में जो बेहतर खाना पकाएगी, कम बीमार होगी, और घर से बाहर निकलकर काम भी करेगी। बदलाव की शुरुआत सिलेंडर से भी हो सकती है। और अगर वो ₹300 की मदद से आ रहा है, तो उसे रोकना नहीं, रोशनी की तरह फैलाना चाहिए।

तो अगली बार जब आप अपने गैस सिलेंडर की कीमत देखें, या सब्सिडी का एसएमएस आए, तो एक पल को सोचिएगा
देश के किसी कोने में किसी मां ने उस दिन अपनी बेटी के लिए बिना खांसे खाना पकाया होगा।किसी घर की पहली भाजी बिना धुएं के बनी होगी। और किसी बच्ची ने पहली बार गैस जलाना सीखा होगा उज्ज्वला की लौ में।
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