सुप्रीम कोर्ट: जमीनी हकीकत को अनदेखा नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दोबारा बहाल करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि “पहलागाम जैसे आतंकी हमलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।” कोर्ट ने केंद्र सरकार से 8 हफ्तों के अंदर जवाब मांगा है।

क्या है मामला?
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया था। इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया जम्मू कश्मीर और लद्दाख। इसके खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं।
दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को संवैधानिक माना, लेकिन साथ ही कहा कि राज्य का दर्जा भविष्य में बहाल किया जाना चाहिए।
अब कोर्ट ने क्या कहा?
CJI बी. आर. गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने जमीनी हालात और सुरक्षा पहलुओं को अनदेखा न करने की बात कही। कहा “केवल संवैधानिक बहस नहीं, स्थानीय सुरक्षा हालात भी निर्णय में अहम होंगे।” केंद्र सरकार को 8 हफ्तों में लिखित जवाब देने का निर्देश दिया।
केंद्र सरकार की स्थिति:
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा:
“केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि चुनावों के बाद जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। प्रक्रिया चल रही है।”
याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिका दायर करने वाले प्रोफेसर जहूर अहमद भट और खुर्शीद अहमद मलिक का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण हुए हैं। राज्य में अब सुरक्षा और लोकतंत्र बहाल हो चुका है। राज्य का दर्जा न मिलने से संविधान की संघीय भावना प्रभावित हो रही है।
धारा 370 क्या थी और क्यों हटाई गई?
अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता था, जिसमें
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अलग संविधान
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अलग झंडा
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भारत के कुछ कानूनों से छूट
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बाहरी लोगों को जमीन खरीदने की मनाही
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सरकार का तर्क था कि इस प्रावधान के कारण राज्य में विकास धीमा था आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा मिला राज्य राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग रहा
क्या होगा आगे?
अक्टूबर 2025 तक केंद्र को कोर्ट में जवाब देना होगा। अगर केंद्र राज्य का दर्जा बहाल करने की योजना पेश करता है, तो कोर्ट अगली कार्रवाई करेगा। राज्य के लोगों को प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकार फिर से मिलने की संभावना बन सकती है।
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