
जून 2025 में इजराइल और अमेरिका के साथ हुई 12-दिन की जंग के बाद, ईरान ने एक आक्रामक अभियान की शुरुआत की जिसमें 21,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जासूसी के आरोपों से घेरा गया। यह कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रही, कुछ मामलों में फांसी की सजा भी सुनाई गई।
तलाशी अभियान की तेजी
- 21,000 पकड़े गए
ईरानी पुलिस प्रवक्ता सईद मोंतजेरोलमहदी के अनुसार, इस अवधि में 21,000 संदिग्धों की गिरफ्तारी की गई, जिसमें आम नागरिकों, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों तक को शामिल किया गया है - जनता का योगदान
लोगों से संदिग्धों की सूचना देने का आग्रह था जिसकी वजह से ऐसी सूचनाओं में 41% की वृद्धि हुई, जिससे गिरफ्तारी अभियान और तेज हुआ - जासूसी और अन्य आरोप
इनमें से 260 से अधिक पर इजराइल के लिए जासूसी का संदेह था, और 172 लोगों को अवैध फिल्मांकन के आरोप में गिरफ्तार किया गया - चेकपॉइंट्स और साइबर मामलों
देशभर में 1,000 से अधिक चेकपॉइंट स्थापित किए गए थे। साथ ही 5,700 साइबर अपराध केस जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी को भी सुलझाया गया
7 फांसी और अफगानी निर्वासन
फांसी की सजा
ईरान ने इस जंग के बाद जासूसी के आरोपों में 7 व्यक्तियों को फांसी दी, जिनमें परमाणु वैज्ञानिक रूजबे वादी (Rouzbeh Vadi) भी शामिल थे, जिन पर माना जाता है कि उन्होंने मुसाद एजेंसी को संवेदनशील जानकारी उपलब्ध कराई थी
इस अभियान में पूर्व में 3 कुर्द नागरिक Edris Ali, Azad Shojaei, Rasoul Ahmad Rasoul को भी फांसी दी गई, उन पर आरोप था कि उन्होंने 2020 में वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की हत्या में मदद की थी
अफगानी शरणार्थियों का निर्वासन
इस अभियान में अफगानी शरणार्थियों को भी निशाना बनाया गया करीब 2,774 अप्रवासी अफगानों को निष्कासित किया गया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, मात्र दो महीनों में 13 लाख से अधिक अफगान शरणार्थी ईरान छोड़कर लौट चुके हैं, और यह संख्या वर्षांत तक 30 लाख तक जा सकती है

डर की राजनीति और अधिकारहीनता का दुष्चक्र
यह कार्रवाई केवल सुरक्षा उपाय नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव का संकेत है जहां भय, नियंत्रण और कार्रवाई की राजनीति मिलकर देश में अस्थिरता के बीज बो रही है। गिरफ्तारियों की संख्या और चरम सजा ने दिखाया कि अपराध विवरण से ज्यादा, शासन की मंशा बयान हो रही है। अफगान शरणार्थियों की बड़ी संख्या में वापसी ने मानवीय संकट का एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मानवाधिकार समूहों ने इस अभियान की न्यायिक असावधानी और दमनकारी स्वरूप पर चिंता जताई है
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