उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन उत्तराखंड के दो दिवसीय दौरे पर गुरुवार को देहरादून पहुंचे। जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनका स्वागत किया। इसके बाद उपराष्ट्रपति सड़क मार्ग से देहरादून के लिए रवाना हुए। अपने दौरे के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आईजीएनएफए) में भारतीय वन सेवा के परिवीक्षाधीन अधिकारियों से संवाद किया।
IFS अधिकारियों को विकसित भारत का दायित्व
उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय वन सेवा के अधिकारी विकसित भारत @2047 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। देश के जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन की बड़ी जिम्मेदारी इन अधिकारियों के कंधों पर होगी।
पर्यावरण सुरक्षा में वन सेवा की अहम भूमिका
उन्होंने कहा कि भारतीय वन सेवा का योगदान देश की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही वर्ष 2070 तक भारत के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने में भी वन और प्राकृतिक संसाधनों की अहम भूमिका है। उन्होंने अधिकारियों से पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने की अपील की।
विकास और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं
उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना संभव है। अधिकारियों को संरक्षण, विकास, पारिस्थितिक सुरक्षा और लोगों की आजीविका के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की दिशा में काम करना चाहिए।
व्यक्तिगत सफलता नहीं, टीम उत्कृष्टता जरूरी
सीपी राधाकृष्णन ने अधिकारियों से व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय टीम वर्क को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बड़े लक्ष्यों को सामूहिक प्रयासों से ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान देने की जरूरत पर भी जोर दिया।
ईमानदारी को बताया गैर-परक्राम्य
उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी को ‘गैर-परक्राम्य’ बताते हुए कहा कि अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा और पारदर्शिता के साथ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवा में पद से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता का विश्वास होता है।
तकनीक को जमीनी अनुभव से जोड़ने की सलाह
उन्होंने अधिकारियों से रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित प्रणालियों का उपयोग बढ़ाने को कहा। साथ ही उन्होंने इन आधुनिक तकनीकों को क्षेत्रीय अनुभव और जमीनी परिस्थितियों से जोड़कर इस्तेमाल करने की सलाह दी।
वन सेवा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
उपराष्ट्रपति ने भारतीय वन सेवा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को सकारात्मक बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान बैच में करीब 17 प्रतिशत महिला अधिकारी हैं। यह वन सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और भागीदारी को दर्शाता है।
‘राष्ट्र प्रथम’ हमेशा सर्वोपरि रहे
उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि उनके कॅरिअर की सफलता का आकलन इस बात से होना चाहिए कि उन्होंने कितने जंगलों को बचाया और बहाल किया, वन्यजीवों की कितनी रक्षा की और स्थानीय समुदायों का कितना विश्वास जीता। उन्होंने अधिकारियों से ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को हमेशा सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।