108 साल की अखंड परंपरा
जब 1917 में इस गुरुद्वारे की नींव रखी गई थी, तब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। उस दौर में भी यहां दीवान का आयोजन होता था, जिसमें स्थानीय संगत के साथ-साथ ब्रिटिश अधिकारी भी शामिल होते थे। ऐतिहासिक किस्सों के अनुसार अंग्रेज अधिकारी विशेष आमंत्रण पर दीवान में आकर गुरबाणी सुनते थे और संगत में सिर झुकाकर सम्मान प्रकट करते थे।
धार्मिक और सामाजिक केंद्र
लंढौर गुरुद्वारा सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं रहा, बल्कि यह स्थानीय समाज, शिक्षा और सेवा का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां से चलने वाले सामाजिक कार्यों और परंपराओं ने मसूरी-लंढौर के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया है।Mussoorie Landour: नगर कीर्तन से हुई शुरुआत
इस वर्ष के 108वें सालाना दीवान की शुरुआत भव्य नगर कीर्तन से हुई। नगर कीर्तन की यात्रा लंढौर चौक से शुरू होकर गांधी चौक तक पहुंची। पूरा शहर “जो बोले सो निहाल... सत श्री अकाल” के जयकारों से गूंज उठा।‘पंज प्यारे’ और शबद-कीर्तन जत्थे
नगर कीर्तन में ‘पंज प्यारे’ ने परंपरागत अंदाज में अगुवाई की। साथ ही, शबद-कीर्तन जत्थों की प्रस्तुतियों ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
गुरु नानक फिफ्थ सेंटेनरी स्कूल का बैंड
इस मौके पर गुरु नानक फिफ्थ सेंटेनरी स्कूल (GNFCS) के छात्रों ने बैंड की शानदार प्रस्तुति दी, जो नगर कीर्तन का विशेष आकर्षण बना।गुरुद्वारा परिसर में भव्य आयोजन
नगर कीर्तन के बाद गुरुद्वारा परिसर में विशाल लंगर सेवा का आयोजन किया गया। इसमें न केवल सिख समुदाय, बल्कि अन्य धर्मों और वर्गों के लोगों ने भी एक साथ बैठकर भोजन किया। यह दृश्य भाईचारे, समानता और सेवा की परंपरा का प्रतीक बना।Mussoorie Landour: संगत की श्रद्धा
गुरुद्वारे में आयोजित शबद-कीर्तन और अरदास के दौरान संगत की श्रद्धा देखते ही बनती थी। श्रद्धालु दूर-दूर से इस आयोजन का हिस्सा बनने पहुंचे।