मौण मेला का आयोजन

1866 से चली आ रही परंपरा का साक्षी बना मौण मेला, अगलाड़ नदी में उतरे हजारों ग्रामीण

मसूरी के जौनपुर क्षेत्र में मौण मेला आयोजित किया गया, जिसमें स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता को दर्शाया गया।

1866 से चली आ रही परंपरा का साक्षी बना मौण मेला, अगलाड़ नदी में उतरे हजारों ग्रामीण

मौण मेला का आयोजन

मसूरी के जौनपुर क्षेत्र की लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक ऐतिहासिक मौण मेला शनिवार को अगलाड़ नदी के तट पर पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजित किया गया। ढोल-दमाऊ की गूंज, लोकनृत्य और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बीच शुरू हुए इस ऐतिहासिक मेले में मसूरी सहित आसपास के 114 से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीणों ने भाग लिया। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग पूरे दिन इस अनूठे लोक पर्व के साक्षी बने।

मेले का शुभारंभ

मेले का शुभारंभ पारंपरिक विधि-विधान के साथ किया गया। ग्रामीणों ने टिमरू की छाल से तैयार औषधीय पाउडर (मौण) को अगलाड़ नदी में प्रवाहित किया। जैसे ही पाउडर नदी की धारा में बहा, हजारों ग्रामीण पारंपरिक उपकरणों के साथ नदी में उतर गए और सामूहिक रूप से मछली पकड़ने की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया।

लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महापर्व

स्थानीय निवासी राजेश नौटियाल और सूरज सिंह रावत ने बताया कि इस वर्ष टिमरू का पाउडर तैयार करने की जिम्मेदारी कांडी तल्ला, कांडी मल्ला, मेलेंगढ़, सड़ब तल्ला, सड़ब मल्ला, बेल, परोगी सहित कई गांवों के ग्रामीणों ने निभाई। उन्होंने बताया कि यह केवल मछली पकड़ने का आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महापर्व है, जिसका पूरे क्षेत्र को वर्षभर इंतजार रहता है।

कब हुई मेले की शुरुआत

ग्रामीणों के अनुसार इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत वर्ष 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश द्वारा की गई थी। तब से यह परंपरा बिना किसी रुकावट के आज भी जीवित है। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन मौण मेले की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक महत्व आज भी बरकरार है।

मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया जाता। टिमरू की छाल से तैयार प्राकृतिक पाउडर कुछ समय के लिए मछलियों को अचेत कर देता है, जिससे उन्हें आसानी से पकड़ा जा सकता है। जो मछलियां पकड़ में नहीं आतीं, वे थोड़ी देर बाद ताजे पानी में फिर सामान्य होकर जीवित हो जाती हैं। इस कारण यह परंपरा पर्यावरण और जलीय जीवन के अनुकूल मानी जाती है।

ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य 

मेले में जौनपुर और जौनसार की समृद्ध लोक संस्कृति की झलक देखने को मिली। ढोल-दमाऊ की थाप पर ग्रामीणों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए। महिलाएं लोकगीत गाती रहीं, जबकि युवा और बच्चे पारंपरिक उपकरणकृकुंडियाड़ा, फटियाड़ा, जाल और हाथों से मछलियां पकड़ते नजर आए। शाम को ग्रामीण अपने गांव लौटकर इस पारंपरिक पर्व का उत्सव मनाते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि आधुनिकता के दौर में भी इस तरह के पारंपरिक मेले न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं।

सुनील सोनकर की रिपोर्ट

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