हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने गुरुग्राम विश्वविद्यालय में आयोजित ‘जेन-एच युवा उद्यमी चौपाल’ कार्यक्रम में युवाओं के साथ अपने राजनीतिक सफर के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि सफलता तक पहुंचने के लिए उनके पास कोई शॉर्टकट नहीं था।
यह सफर लगातार मेहनत, संघर्ष और लोगों के बीच रहकर काम करने से तय हुआ। सैनी ने बताया कि वर्ष 1996 में जब वह पंचकूला स्थित भाजपा कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह हरियाणा के मुख्यमंत्री बनेंगे।
‘मेरे राजनीतिक सफर में कोई लिफ्ट नहीं थी’
राजनीति में बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के आगे बढ़ने के सवाल पर सैनी ने अपने सफर की तुलना सीढ़ियों से की। उन्होंने कहा कि उनके राजनीतिक सफर में कोई लिफ्ट नहीं थी, केवल सीढ़ियां थीं। कई बार तो ऐसी स्थिति भी आई, जब अगला कदम तक दिखाई नहीं देता था।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राजनीति में आने के बाद उनकी पहली जिम्मेदारी खुद चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि किसी अन्य उम्मीदवार के चुनाव अभियान में काम करना थी। वह इस दौरान रात 2 बजे तक मेहनत करते थे। वर्ष 2009 में जब उन्हें खुद चुनाव लड़ने का अवसर मिला, तब उनके पास चुनाव के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे। ऐसे मुश्किल समय में लोगों ने उनकी मदद की और चुनाव लड़ने में उनका साथ दिया।
हालांकि, सैनी उस चुनाव में हार गए। लेकिन उन्होंने हार को अपनी पहचान बनने नहीं दिया। उन्होंने तय किया कि वह असफलता से सीखेंगे और आगे बढ़ते रहेंगे।
हार के अगले दिन ही पहुंच गए लोगों के बीच
सैनी ने बताया कि चुनाव हारने के अगले ही दिन वह दोबारा लोगों के बीच पहुंच गए। उस समय उनके पास कोई पद नहीं था और न ही अगले चुनाव में टिकट मिलने की कोई गारंटी थी। इसके बावजूद उन्होंने लोगों के बीच काम करना जारी रखा। उनकी इसी मेहनत का परिणाम रहा कि वर्ष 2014 में उन्हें बड़ी चुनावी जीत मिली।
मुख्यमंत्री ने वर्ष 1996 की एक घटना भी साझा की। उन्होंने बताया कि उस समय नरेंद्र मोदी हरियाणा भाजपा के प्रभारी थे और उन्होंने पंचकूला स्थित पार्टी कार्यालय में एक कंप्यूटर भेजा था। सैनी ने कहा कि उस कंप्यूटर पर काम करते हुए उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि भविष्य में वह राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे।
‘नेशन फर्स्ट’ को हमेशा रखा सबसे ऊपर
वर्ष 2014 से पहले के राजनीतिक दौर को याद करते हुए सैनी ने कहा कि उस समय युवाओं का इस्तेमाल तो किया जाता था, लेकिन जब कोई युवा आगे बढ़ने की आकांक्षा रखता था तो कई बार उसकी महत्वाकांक्षाओं को दबा दिया जाता था।
2009 की हार से मिली सीख का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वह उसी दिन दोगुने उत्साह के साथ फिर खड़े हो गए थे। उनके लिए पद कभी सबसे महत्वपूर्ण नहीं रहा। ‘नेशन फर्स्ट’ की भावना हमेशा उनके लिए सर्वोपरि रही।
सैनी ने कहा कि लोगों की मदद करने की इच्छा ने उन्हें लगातार काम करने की प्रेरणा दी। वर्ष 2014 में जनता का समर्थन मिला और लोगों ने उन्हें चुना। इसके बाद पार्टी ने उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी दी। आगे चलकर सांसद, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और फिर मुख्यमंत्री बनने का अवसर भी उन्हें जनता के स्नेह, अपनी जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्धता और पार्टी की ओर से मिले अवसरों के चलते मिला।