भारत में सावन का महीना शिवभक्ति, झमाझम बारिश और हरियाली के लिए जाना जाता है। इस दौरान ज्यादातर लोग मांस-मछली और शराब से पूरी तरह दूरी बना लेते हैं। अक्सर हम इसे सिर्फ आस्था और धर्म से जोड़कर देखते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस नियम के पीछे एक बहुत ही गहरा विज्ञान भी छिपा है? आइए जानते हैं वो वैज्ञानिक कारण, जो बताते हैं कि सावन के दौरान शाकाहारी होना आपकी सेहत के लिए कितना जरूरी है।
धीमा पड़ जाता है हमारा पाचन तंत्र
बारिश के मौसम में सूरज की रोशनी कम होती है और हवा में नमी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। विज्ञान और आयुर्वेद दोनों यह मानते हैं कि इस मौसम में हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म यानी पाचन तंत्र धीमा हो जाता है। मांस और मछली भारी भोजन होते हैं, जिन्हें पचने में शरीर को बहुत ज्यादा ऊर्जा और समय लगता है। कमजोर पाचन के दौरान इन्हें खाने से पेट दर्द, गैस, अपच और डायरिया जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है।
तेजी से पनपते हैं बैक्टीरिया और फंगस
मानसून का मौसम कीड़े-मकौड़ों, फंगस और खतरनाक बैक्टीरिया के पनपने का सबसे अनुकूल समय होता है। नमी के कारण इस मौसम में मांस बहुत जल्दी खराब होता है। कच्चा या ठीक से न पका हुआ मांस खाने से फूड पॉइजनिंग और अन्य गंभीर संक्रमण होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
मछलियों का ब्रीडिंग सीजन
बारिश का मौसम जलजीवों, खासकर मछलियों के अंडे देने यानी प्रजनन का समय होता है। विज्ञान के नजरिए से, इस समय मछलियों के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं। ऐसी मछलियों का सेवन करने से इंसानों के शरीर में भी नुकसानदायक तत्व जा सकते हैं। इसके अलावा, प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए भी गर्भवती मछलियों का शिकार करना सही नहीं माना जाता है।
आयुर्वेद का सात्विक नियम
आयुर्वेद के अनुसार, मानसून में शरीर के 'वात' और 'पित्त' दोष असंतुलित हो जाते हैं, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसलिए सावन के महीने में सात्विक भोजन करने और व्रत रखने की सलाह दी जाती है। यह प्रक्रिया शरीर को अंदर से डिटॉक्स करती है और बीमारियों से बचाती है।
इसलिए, जब कोई आपसे कहे कि सावन में नॉन-वेज छोड़ना सिर्फ एक अंधविश्वास है, तो आप उन्हें इसके पीछे का यह विज्ञान बता सकते हैं।